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खेल से खेल तक

शनिवार, 20 जुलाई 2013

भारत रत्न ! मेज़र ध्यानचंद


भारतीय खेलों के इतिहास में... एक ऐसा वीर पैदा हुआ ... जिसकी चर्चा उनके मरणोपरांत भी फैंस में सिहरन पैदा कर देती है... जी हां 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद के राजपूत फैमिली में जन्मे.. मेजर ध्यानचंद बचपन से ही  प्रतिभा के धनी और हुनरमंद थे.. .21 वर्ष की उम्र में ध्यानचंद को न्यूज़ीलैंड जानेवाली भारतीय टीम में चुन लिया गया. इस दौरे पर भारतीय सेना की टीम ने 21 में से 18 मैच जीते...13 मई 1926 को पहली बार ओलंपिक मुकाबलों के लिए हॉकी थामने वाले ध्यानचंद... हर मौके पर अपने हुनर का जबरदस्त परियच दिया.. हालांकि 1928 एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में पहली बार जब भारतीय टीम ने भाग लिया.. तो उस वक्त सबकी निगाहें.. इस जादूगर पर ही टिकीं थी.. मेजर ध्यानचंद की फुर्ती और गोल की बदौलत यहाँ चार मैचों में भारतीय टीम ने 23 गोल किए...जिसमें फाइनल मुकाबले में ध्यानचंद ने अहम् 2 गोल ठोककर खिताबी  जीत दिलाई.. लेकिन ये तो सिर्फ शुरूआत थी.. जब मौका 1932 लास एंजिल्स ओलम्पिक की आई.. तो यहां सेंटर फॉरवर्ड के तौर पर मशहूर हो चुके ध्यानचंद की ही बदौतल..फाइनल मुकाबले में भारतीय टीम को अमेरिका के खिलाफ 24-1 से शानदार जीत मिली...जिसमें हॉकी के इस जादूगर ने 8 गोल किए.. तो वहीं इस पूरे टूर्नामेंट में रिकार्ड 101 गोल कर सुर्खियों में छा गए..उस वक्त एक अमेरिकी अखबार ने लिखा था कि..भारतीय हॉकी टीम .. तूफानी अंदाज में खेली..जिसने अपनी रफ्तार से अमेरिकी टीम के ग्यारह खिलाड़ियों को कुचल कर रख दिया... वक्त जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था..वैसे वैसे मेजर ध्यानचंद भी कामयाबी की बुलंदियों को छूते जा रहे थे.. हर कोई ध्यानचंद को दद्दा कहकर बुलाने लगा.. ध्यानचंद अब हॉकी के जादूगर बन चुके थे.. औऱ 1936 बर्लिन ओलंपिक ने तो ध्यानचंद की किस्मत ही बदलकर रख दी..  हिटलर के देश मे होने वाले इस ओलंपिक में ध्यानचंद कप्तान की हैसियत से पहुंचे.. जहां 15 अगस्त 1936 को फाइनल मुकाबले में ध्यानचंद की टीम ने मेजबान जर्मनी को 8-1 से हराकर सनसनी फैला दिया..ध्यानचंद की गजब की फुर्ती देखकर खुद तानाशाह हिटलर ने उन्हें मार्शल की उपाधि की पेशकश की.. लेकिन देशभक्ति और जीत से लबरेज ध्यानचंद ने इस पेशकश को ठुकरा दिया...  औऱ उस वक्त खुद  उन्हें ये अंदाज़ा भी नहीं था कि 11 वर्षों के बाद यह दिन भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण बन जाएगा..अप्रैल 1949 में हॉकी को अलविदा कहने वाले ध्यानचंद अपने इंटनेशनल करियर में 400 से भी ज्यादा गोल किए.. जो आज भी रिकॉर्ड है..  --------------------------------------------------------------------------------------- खिलाड़ियों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजे जाने की बहस काफी पुरानी है... जबसे खेलों को इस कैटेगरी में शामलि किया गया .. तब से ही मेजर ध्यान चंद के अलावा....क्रिकेट के भगवान का रुतबा रखने वाले सचिन ... देश को 1960 के ओलंपिक में बेहद मुश्किल हालात होने के बावजूद .. टॉप 4 में पहुंचने वाले मिल्खा सिंह ... शतरंज की दुनिया के बेताज़ बादशाह ... विश्वनाथन आनंद का नाम ... इस सम्मान को लेकर  ज़ोर पकड़ने लगा ... बहस छिड़ी की आखिरी ये सम्मान  किसे दिया जाए ... बहस तीखी इसलिए भी थी .. क्योंकि यहां होड़ पहले पाने की भी लगी थी ... लेकिन आखिरकार जब बात भारत रत्न के लिए पहले खिलाड़ी को नामांकित करने की आई तो दद्दा यानी मेजर ध्यान चंद के सामने बाकी खिलाड़ियों की दावेदारी कमजोर पड़ गई...इसका ये मतलब ये कतईं नहीं कि बाकियों को दरकिनार समझा जाए ... लेकिन दद्दा रुतबा उस दौर में जरूर ऐसा था जिसे जिसने सुना ... जिसने देखा खुद को धन्य समझा ...आपको बताते हैं .. भारत रत्न की इस दावेदारी में किसकी क्या उपलब्धियां रहीं ...   मिल्खा ने दिखाया दम   दौर मुश्किल था ... खेलों को लेकर जागरुकता कम ... तो उस दौर में नाम आया ... मिल्खा सिंह का .. जिन्होंने भारतीयों को ये यकीन दिलाया कि एथलेटिस में हम कुछ कर सकते हैं ... क्योंकि इससे पहले तक भारतीय एथलीट्स को इस काबिल ही नहीं समझा जाता  था .. कि वो ओलंपिक में हिस्सा भी ले सकें... लेकिन 1960 ओलमपिक में मिल्खा देश के सबसे कामयाब एथलीट बने .. जो टॉप 4 में आने में कामयाब रहे ।   सचिन 'तुस्सी गॉड हो' !   सचिन देश का वो रत्न जिसे भारत रत्न देने की मांग  चलते ही .. भारत त्न को खेलों में सामिल किया गया ... सचिन के कद का अंदाज़ा तो आपको है ही .. जिनके नाम तो क्रिकेट में इतने रिकॉर्ड दर्ज हैं .. कि जब भी वो बल्लेबाज़ी करने उतरते  .. को ना को रिकॉर्ड तो बन ही जाता है... सचिन का आज वर्ल्ड क्रिकेट में जो रुतबा है .. उसे दुनिया सलाम करती है .   दद्दा 'द ग्रेट' डरते थे अंग्रेज़   लेकिन तमाम दूसरे खिलाड़ियों के रसूख के बावजूद .. मेजर ध्यानचंद का कोई सानी नहीं ।... जिनके स्वर्णिम युग को आज भी ओलंपिक सलाम करता है .. हमारे दद्दा के रुतबे का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है ... कि गुलाम होने के बावजूद दद्दा का अंग्रेज़ों के जहन में इतना खौफ था कि .. कि 1936 बर्लिन ओलंपिक्स में अंग्रेज़ों ने दद्दा के डर से अपनी टीम ही नहीं उतारी --------------------------------------------------------------------------------------  हॉकी के गॉड मेजर ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी ओर खिलाड़ी के बारे सुने गए हों। आइए एक नजर डालते है हॉक की जादूगर ध्यानचंद से जुड़े ऐसे ही कुछ दिलचस्प किस्सों पर।   कैसे जुड़ा नाम में चंद   16 साल की उम्र में फौज में भर्ती होने के बाद...ध्यानचंद अपनी हॉकी की ज्यादातर प्रैक्टिस रात के वक्त करते...उस जामने में  FLOOD LIGHT की वयवस्था नहीं थी... ऐसे में वो हर रात  चांद के निकलने के लिए प्राधना करते...जिसके उनके साथियों नें उनके नाम के साथ चांद या कहे चंद लगाना शुरू कर दिया...   रेल की पटरी पर चढ़ा खेल परवान   कहां जाता है की ध्यानचंद रेल की बेहद पतली पटरी पर गेंद को रख..काफी दूर के इसे अपने स्टिक के साथ ले जाते...ये इतनी पतली पटरी पर प्रैक्टिस की ही देन.. थी कि वो आगे चल कर हॉकी के सबसे बड़े जादूगर बन गए।   कई बार हुई जादुई स्टिक की जांच   खेल के दौरान गेंद इस कदर ध्यानचंद की स्टिक से चिपकी रहती कि विरोधी खिलाड़ियों को अक्सर लगता की वो जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहां तक की हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई। जापान में  उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई..लेकिन हर बार लोगों की ये बाते गलत साबित हुई।   हिटलर भी थे हॉकी के गॉड के मुरीद   ध्यानचंद एक ऐसी हस्ती थे जिनके आगे दुनिया का सबसे क्रूर तानाशाह एडोल्फ हिटलर भी नतमस्तक हो गया था...ध्यानचंद की खेल की प्रतिभा को देखकर हिटलर उनके सामने जर्मनी की सेना में बड़े पद पर शामिल हो कर जर्मनी के लिए खेलने का  प्रस्ताव रख दिया..लेकिन ध्यानचंद ने विनम्रता से हिटलर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया..इतना ही नहीं इसके बाद हिटलर ने ध्यानचंद की हॉकी स्टिक खरीदने की भी मांग की थी जिसके लिए वो मुंहमांगे दाम देने को तैयार थे।   क्रिकेट के डॉन भी ध्यानचंद के कायल ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था...अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह से गोल करते हैं.. जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं।    SPORTS DESK, LIVE INDIA   --------------------------------------------------------------------------------------- आज भारत में खेल का मतलब क्रिकेट और क्रिकेट का मतलब सचिन तेंदुलकर है...लेकिन एख वक्त था जब हिंदुस्तान का मतलब हॉकी और हॉकी का मतलब जादूगर ध्यानचंद हुआ करता था ...दुनिया भर में हॉकी के जादूगर के नाम से मशहूर महान हॉकी मेजर ध्यानचंद सिंह ने अपने हॉकी के कौशल से पूरी दुनिया को अपना कायल बना लिया था..अपने  करियर में  एक हजार से ज्यादा गोल करने का कारनामा करने वाले ध्यानचंद को कई अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है.. आज भारत रत्न को छोड दिया जाए तो कोई ऐसा अवॉर्ड नहीं है जो ध्यानचंद के खाते में ना हो.. साल 1956 में ध्यानचंद को पद्म भूषण के सम्मान से सम्मानित किया गया...    मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन को... भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है...    इतना ही नहीं ध्यानचंद के जन्मदिवस के मौके पर ही भारत सरकार खेलों की दुनिया में शानदार प्रदर्शन करने वालों को राष्ट्रीय पुरस्कार.... अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित करती है...    भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी घोषित किया था।   भारत का सबसे बड़ा LIFETIME ACHIVEMENT अवॉर्ड ध्यानचंद ऑवर्ड हॉकी के जादूगर के नाम पर ही रखा गया है...जो उन RETIRED खिलाड़ियों को दिया जाता है जिन्होनें खेल से संन्यास लेने के बाद भी खेल के सुधारने में अपना योदगान देते रहते हैं ...   दिल्ली में नेशनल स्टेडियम का नाम बदल कर साल 2002 में ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम रखा गया ।   इतना ही नहीं भारत सरकार ने ध्यानचंद के सम्मान में उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी किया  है ।   भारत के अलावा दुनिया के अनेक दिग्गजों ने भी ध्यानचंद की प्रतिभा का लोहा माना ...मेजर ध्यानचंद ने हॉकी के जरिए हिंदुस्तान का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया .....जिसे आने वाले कई सदियों तक याद रखा जाएगा। -------------------------------------------------------------------------------------- अपनी हॉकी की जादूगरी से एक जमाने में भारत के गौरवांवित करने वाले ध्यानचंद को सज़दा करने का वक्त आ गया है  .. वक्त आ गया है .. जब भारत अपने इस सबसे बड़े रत्न हो .. भारत रत्न से सम्मानित करें ... जिसके लिए आखिरकार खेल मंत्रालय ने भी आदिकारिक रूप से हरी झंडी देते हुए .. दद्दा के नाम के सिफारिश प्रधानमंत्री को भेज़ दी है ...  साल 2011 में हुई थी पहल  खेल मंत्रालय ने इस बार मेजर ध्यान चंद का नाम ज़रूर भेजा है...लेकिन दद्दा को बारत रत्न मिले ये मांग दिसंबर 2011 से ही उठने लगी थी .. जब उस वक्त के खेल मंत्री अजय माकन की पहल पर बकायदा  82 सासंदों ने ध्यानचंद के लिए वकालत करते हुए ... हॉकी के जदूगर को ये सम्मान देने की मांग की थी ... जिसके बाद जनवरी 2012 में खेल मंत्रायल ने ध्यानचंद के साथ ..शूटर अभिनव बिंद्रा...और पर्वतारोही ...तेंजिंग नॉर्गे ...का नाम भेजा था ...लेकिन सचिन का नाम उस वक्त भी नदारद था .. क्योंकि BCCI ने इसमें कोई दिलचस्पी दिखाई ही नहीं थी ..   सचिन पर भारी दद्दा की हॉकी   हालांकि इस बार भी भारत रत्न पर दद्दा के नाम को लेकर मुहर युं ही नहीं लगाई गई .. क्योकि लगातार सचिन के नाम लेकर भी बहस छिड़ी हुई थी कि आखिरी किसे पहले भारत के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान  से नावाजा जाए .. लिहाजा खेल मंत्रालय ने बाकायदों 12 जुलाई को एक मीटिंग बुलाई .. जिसमें दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका दिया गया ...  मेजर ध्यान चंद के लिए अगुवाई की ...उनके बेटे ... अशोक कुमार ने जिनका दावा था .. कि वो दद्दा के केल का असर था जिसके चलते ना सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में हॉकी को पहचान मिली ... वो मेजर ध्यान चंद का जलवा था कि  देश ने ओलंपिक में अपना स्वर्णिम युग जिया ... जिसमें 1928, 1932, 1936 ओलंपिक के दौरान ... जो पदक भारत ने जीते उसमें ... ध्यान चंद की जादूई हॉकी का अहम रोल रहा ... जिसके बाद  खेल मंत्रीं ने ये भरोसा दिलाया कि वो मेजर साहब का नाम ही भारत रथ्न के लिए प्रधानमंत्री को भेजेंगे .. जबिक सचिन के नाम को लेकर ये माना गया .. कि सचिन अभी भी एक्टिव प्लेयर हैं ..और उनके पास आगे भी इस सम्मान को हालांकि का मौका बना रहेगा ... ----------------------------------------------------------------------------------------  ताउम्र हॉकी में धमाल मचाने के बाद दुनिया में ना सिर्फ अपना बल्कि भारत का नाम रौशन करने के बाद साल 1948 में भारत के इस जादु हॉकी खिलाड़ी के रुतबे का सूरज ढलने लगा ...क्योंकि अब बक्त था .. अलविदा का ... अब वक्त था उस विदाई का जिसे दुनिया भर के हॉकी प्रेमियों ने देश की सीमाओं से परे निकल कर जिया .. दद्दा अब संन्यास लेने वाले थे ...साल 1948 में जब भारतीय हॉकी टीम ईस्ट अफ्रीका के दौरे पर थी .. तभी हॉकी इस जादूगर ने हॉकी को अलविदा कहने का मन बना लिया .. अफ्रीकी दौरे  वापस लौट मेजर ध्यानचंद ने सीरियस हॉकी से खुद को अलग कर लिया ... इसके बाद वो कभी कभार ही किसी अग्ज़ीबीशन या दौस्ताना मैच में देखे जाते थे ... ये वो दौर था .. जब ध्यानचंद अपने चाहे वाले से हॉकी के मौदान दूर हो रहे थे ... मेजर ध्यान चंद ने आखिरी के दिनों में रेस्टऑफ इंडिया की अगुवाई करते हुए ... भारत की 1948 ओलंपिक टीम के किलाफ अपना मुकाबला .. जिसे चांद की टीम तो गवां बैठी .. लेकिन 48 वर्षिय मेजर यहां भी अपनी टीम के लिए इकलौता करने वाले खिलाड़ी थे ... इसके बाद मेजर ध्यान चंद ने आकिरी बार ... बंगाल के खिलाफ मैदान में हॉकी लेकर उतरे .. जहां ..इस लिजेंड के सम्मान के साथ विदा दी गई ...इसके बाद साल 1956 में ध्यानचंद ने आर्मी से मेजर की पोस्ट के साथ रिटायर हुए ....जिसके बाद भारत सरकार इसी साल उन्हें .. देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पदम भूषण से उन्हें सम्मानित किया ... इसके बाद अपने हुनर से और ध्यानचंद पैदा करने के इरादे से ... मेजर ने कोचिंग की दुनिया रुख किया ...और कुछ साल चीफ कोच के तौर पर NIS पटियाला में भी बिताया ...जिसके बाद मेजर ध्यान चंद अपनी ज़िदगी के आखिरी दिनों में अपने शहर झांसी वापस लौट गए ..और 3 दिसंबर 1979 को वो दिन भी आ गया .. जब हॉरकी के इस जादुगर ने दुनिया को अलविदा कह दिया ... उस जादुगर ने जिसकी जादुगीरी आज भा भारत को नाज है ..आज बी .. खुद हॉकी को नांज़ है ... मेजर नहीं रहे .. तो धीरे धीरे ... हॉकी भी मानों मरने सी .. इसकी हुकमारानों मेजर की विरासत का ना जाने कैसा ख्याल रखा .. कि ओलंपिक में 8-8 स्वर्ण पदक जीतने वाली मेजर की टीम साल 2008 में ओलंपिक के लिए क्वालिफा तक ना कर सकी ...और जब 2012 लंदन ओलंपिक में क्वालिफाई भी तो .. आखिरी पायदान पर रहे ... आलम ये है.. कि ध्यान चंद को लेकर हॉकी को गर्व था .. आज वहीं हॉकी ... भारत के प्रदर्शन से शर्मसार है।