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खेल से खेल तक

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

स्पीड किंग की वापसी


शूमाकर के लिए सड़के आसान नहीं !


हर खेल में कुछ ना कुछ ऐसे नाम हुए ...हैं ..जिनके नाम से खेल को जाना जाता है ...और उन्ही में से एक है...माइकल शूमाकर..जो एक बार फिर फॉर्मूला वन सर्किट में वापसी को तैयार हैं....फॉर्मूला वन या कार रेसिंग को जितनी पहचान ...माइकल शूमाकर ने दिलाई...उतनी शायद किसी ने नही ...भारत जैसे देश में जहां लोग क्रिकेट को दिवाने है...और दूसरे खेल के ज्यादातर खिलाड़ियों को नही जानते...लोकिन जो लोग दूसरे खेल के बारे में इंटरेस्ट रखते होगे ... शर्तिया कह सकता हूं कि वो ...माइकल शूमाकर के नाम से अनिभिज्ञ नही होंगे ...शूमाकर के नाम कई रिकॉर्ड दर्ज है ...वो 7 बा र फॉर्मूला वन चैंपियनशिप जीतने वाले ...अकेले ड्राइवर है....भला कोई कैसे भूल सकता है कि....साल 2000-2005 तक उन्होने 5 बार लगातार चैंपियनशिप जीतकर ...तहलका जो मचा दिया था......इसमें भी खास बात ये हैं कि ...साल 2002 में उन्होने सारी रेस में पोडियंम फिनिश किया...जिसे हासिल करने वाले वो एकलौते ड्राइवर है....जब शूमाकर अपने करियर की सुपर फॉर्म में थे ..उन दिनों मैं कॉलेज हुआ करता था...रोज़ अखबार में उनकी फोटो देखकर ..मेरा भी इंटरेस्ट ..फॉर्मूला वन की तरफ बढ़ा...शूमाकर मुझे बहुत अच्छे लगने लगे....मुझे याद है कि ...मैं उनका पोस्टर ढूढ़ने मार्केट में निकला ...लेकिन खरीद नही पाया......क्योंकि कोटद्वार ( मेरा गृह नगर )जैसी छोटी जगह में ये मुमकिन नही था.....रिटायरमेंट के अपने आखिरी साल में ...शूमाकर के करोड़ो फैंस की तरह मैं भी चाहता था ..कि वो चैंपियनशिप जीते...लेकिन तब ओलोंसों लय पकड़ चुके थे.....और शूमाकर के लिए फैरारी को दौड़ाना ..उतना आसान नही था.....वो कुछ ग्रा प्री जीतने के बाद ..तीसरे स्थान पर रहे...लेकिन फेरारी और फॉर्मूला वन को पॉपुलैरिटी दिलाने में शूमाकर का बड़ा हाथ रहा.....अब शूमाकर ...दोबारा वापसी को तैयार हैं....वो फेरारी के कंसलटेंट हैं...और फिलिपे मासा की चोट ने उन्हे सर्किट में लौटने के लिए मजबूर किया.....हालांकि ...2006 के बाद ये शूमाकर की पहली फॉर्मूला वन रेस होगी.....और बेशक सड़के उनके लिए नई ना हो ...लेकिन अब हालात बिलकुल जुदा होंगे....

रवीश बिष्ट ( खेल पत्रकार)

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

सानिया ने खत्म किया खिताबी सूखा

लेक्सिंगटन ओपन सानिया के नाम
भारत की सर्वोच्च वरीयता प्राप्त महिला टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने अपने देश के प्रशंसकों की जबरदस्त हौसला अफजाई के बीच 50 हजार डालर ईनामी अंतरराष्ट्रीय टेनिस महासंघ [आईटीएफ] लेक्सिंग्टन चैलेंजर टेनिस टूर्नामेंट का एकल खिताब जीत लिया। सानिया ने छह साल बाद कोई चैलेंजर खिताब जीता है।
सानिया ने मुकाबलें में फ्रांस की जूली कोइन को 7-6, 6-4 से हराया। सानिया ने सेमीफाइनल मुकाबले में चीन की खिलाड़ी युआन मेंग को तीन सेट तक चले मुकाबले के बाद 6-1, 4-6, 6-4 से हराया था। विश्व की 83वीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी सानिया को अपने करियर का दूसरा चैलेंजर खिताब हासिल करने के लिए छह साल इंतजार करना पड़ा। इससे पहले सानिया ने 2003 में चैलेंजर खिताब जीता था। अगस्त में खेले जाने वाले साल के चौथे ग्रैंड स्लैम अमेरिकी ओपन के लिहाज से सानिया की यह जीत काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सानिया इसको लेकर खासा उत्साह थी। आयोजन समिति के एक सदस्य ने बताया, 'सानिया का कद बहुत बढ़ा है। उन्हे यहां खेलते देख आसपास के सभी भारतीय टेनिस प्रेमी यहां पहुंच गए थे। इनमें केंटुकी विश्वविद्यालय के छात्र और सेंट्रल केंटुकी शहर के भारतीय मूल के लोग शामिल है। सबने सानिया की जबरदस्त हौसलाअफजाई की।' जीत के बाद सानिया ने कहा, 'मैं अपने प्रदर्शन से खुश हूं। मेरी सबसे बड़ी ताकत यह है कि मेरे फोरहैड शॉट को कोई नहीं समझ सकता। मैं फोरहैड शॉट कहीं भी लगा सकती हूं। फोरहैड की ताकत और अनुभव के कारण मुझे जीत मिली है। मैं इससे खुश हूं।'

रजनीश कुमार स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

सानिया की सगाई



सानिया की मुसीबत

10 जुलाई दिन शुक्रवार यानि जुम्मे का दिन यू कहें तो इस्लाम धर्म में ये दिन पाक माना जाता है औऱ इसी दिन टेनिस फैंस के दिलों की धड़कन सानिया मिर्जा ने सोहराब मिर्जा को व्हाइट गोल्ड का रिंग पहनाकर अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया। सोहराब को एक आम इंसान से खास बना दिया...खैर सोहराब का कबूलनामा का जामा तो सानिया ने पहन लिया लेकिन अब नई चुनौती सानिया के सामने आ खड़ी हुई है। हालांकि ये चुनौती इतना मुश्किल नहीं है जितना की सानिया के लिए उनकी कलाई की चोट रहा। लाखों करोड़ों फैंस के सवालों को सानिया ने कोर्ट में वापसी का इरादा जताकर एक झटके में तो दे दिया लेकिन क्या अब वो अपने होने वाले शौहर सोहराब मिर्जा के सवालों का जवाब दे पाएंगी। ये सवाल नहीं ये एक सानिया के लिए मुसीबत है।
सानिया ने सोहराब से दो साल बाद शादी करने का फैसला की है...दो साल तक सानिया ने जमकर टेनिस खेलने का फैसला किया है....इस बीच सोहराब ने सानिया से एक सवाल किया कि तुम दो सालों में बेहतरीन टेनिस खेलोगी अगर खेलोगी तो क्या सिंगल्स कैटेगरी में ग्रैंड स्लैम जीत पाओगी ?
ये सवाल सुनकर सानिया ने उनका जवाब न देकर कोर्ट में जमकर अभ्यास कर रही है यानि इशारा साफ है कि इसका जवाब आने वाला वक्त देगा...ये सवाल तो सोहराब का मजाक भरा सवाल लगता है क्योंकि हर कोई जानता है कि सानिया के लिए सिंगल्स कैटेगरी में ग्रैंड स्लैम जीतना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
सोहराब साहब की एक औऱ मुसीबत है वो है सानिया की ड्रेस...सोहराब मिर्जा सानिया को यूं छोटे कपड़े में खेलते ही नहीं देखना चाहते है लेकिन बेचारे सोहराब मिर्जा दिल की ये बात सानिया से जाहिर नहीं कर सकते है क्योंकि वो जानतें है कि कपड़ों के मामलें में सानिया से सवाल पूछना सही नहीं होगा। हालांकि न चाहते हुए भी सोहराब ने ये एलान कर दिया था कि सानिया शादी के बाद भी टेनिस खेलती रहेंगी...ये बात सुनने में अच्छा लगता है लेकिन शादी के बाद सानिया के लिए टेनिस खेलने की चुनौती आसान नहीं होगी....शादी से पहले तो सानिया का प्रदर्शन कुछ सालों से खराब चल रहा है चाहे वो ओलंपिक में रोते हुए बीच खेल के हटना हो या फिर चोट के कारण लंबे वक्त से कोर्ट से दूर रहना है । सानिया जिंदगी में कुछ अच्छा हुआ है तो वो है 2009 ऑस्ट्रेलियन ओपन में मिक्सड डबल्स कैटेगरी में खिताब जीतना हालांकि ये खिताब भी महेश भूपति के बदौलत जीत गई। सानिया जी शादी के बाद टेनिस खेलने का जो वादा कर रही है वो फैंस को एक पल के लिए ठीक लग रहा है लेकिन आगे सोचने पर पता चलता है कि शादी के पहले ही जब कुछ नहीं कर पाई तो शादी के बाद कौन सा पहाड़ तोड़ देंगी। इसलिए सानिया के लिए शादी से पहले दो साल का वक्त है अपने टेनिस खेलने का जिसे आप यूं ही न जाने दो .

रजनीश कुमार

रविवार, 19 जुलाई 2009

धोनी से प्रभावित हैं रविश विष्ट


धोनी मेनिया का फैलता प्रभाव

जब कोई बीमार होता है तो हम उसे डॉक्टर के पास ले जाकर उसका इलाज करवातें है। आप ही सोचिए अगर कोई बीमार होते हुए भी बीमार नहीं हो तो आप क्या करेंगे। चक्कर खा गए न आप..मैं भी सोच में पड़ गया था इन सवालों को लेकर। लाइव इंडिया के एंकर और खेल संवाददाता रविश विष्ट एक मेनिया के शिकार है ये मेनिया बुरा नहीं बल्कि बहुत अच्छा है रविश धोनी मेनिया के शिकार है। रविश जब भी धोनी के बारें में सोचतें या पढ़तें है या फिर साफ शब्दों में धोनी का भूत इनके सर सवार हो गया तो उस दिन रविश धोनी पर एक लेख लिखे बिना मानतें नहीं है। ये अच्छी बात है कि मीडिया की इस भाग दौड़ भरी जिंदगी से थोड़ा वक्त निकालकर रविश अपने मन की शांति के लिए कुछ लिख तो लेते है।
स्पोर्ट्स के ऑफिसियल ब्लॉग पर अपने लेख लिखने वाले रविश के बारें में मैं एक बात आप लोंगों से शेयर करना चाहता हूं । बात उन दिनों की जब टीम इंडिया कुछ दिनों के लिए क्रिकेट से दूर छुट्टियां मना रहीं थी उस वक्त हमारें धोनी महाशय फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में एक निजी चैनल के लिए एक एड की शूटिंग कर रहें थे..ये बात रविश को पता चली तो रविश सीधे कोटला स्टेडियम पहुंच गए....रविश पहुंच तो गए लेकिन एक समस्या उनके सामने खड़ी हो गई ...कैमरा मैन को स्टेडियम के अंदर जाना मना था ऐसी स्थिति में रविश ऑफिस फोन करके कैमरे वाला फोन मंगवाया औऱ शूट किया। ये पढ़ कर तो आप समझ ही गए होंगे की रविश बीमार नहीं बल्कि घोनी मेनिया जर्नलिस्ट है। इसके अलावा आईपीएल के दौरान चेन्नई सुपरकिंग्स के मैच वाले दिन अगर चेन्नई सुपरकिंग्स की टीशर्ट गलती से कोई औऱ पहन लें तो उसे उतारना पड़ता था क्योंकि धोनी टीम के सपोर्टर रविश ये कतई बर्ताश्त नहीं कर सकतें थे कि कोई औऱ उनकी फेवरेट टीम की जर्सी को हाथ लगाए।
ऐसे में एक दिन हमारे ऋषभ भाई ने एक दिन चेन्नई टीम की जर्सी पहन ली तो ऐसी स्थिति में रविश ने एंकरिंग करने से मना कर दिया आखिर में हमारें ऋषभ भाई को जर्सी उतारनी पड़ी। तो ये था रविश की धोनी मेनिया की कुछ राम कहानी। इंसानी जिंदगी में लोगों की मानसिकता ऐसी होती ही है कि वो किसी न किसी क्रिकेटर का मुरीद हो जाता है। अगर कोई क्रिकेटर का मुरीद नहीं होता तो वो हीरो का हो जाएगा या फिर किसी नेता हो जाएगा या फिर किसी महापुरूष का मुरीद हो जाता है। ऐसी स्थिती में लोग सबकुछ भूलकर अपने फेवरेट के बारें में सोचना शुरू कर देता है ऐसा करना कोई बीमारी नहीं बल्कि ये एक प्रकार का मेनिया होता है जो जिंदगी भर उस आदमी के साथ जुड़ा रहता है। रविश आज कामयाबी की ओर अग्रसर है धोनी भी अपनी किस्मत की बदौलत नए नए कारनामें कर रहा है तो हम यही कह सकते है रविश औऱ धोनी की जोड़ी है बेमिसाल।

रजनीश कूमार
खेल संवाददाता

1983 वर्ल्ड कप से बड़ी है 2007 टी-20 w'cup की जीत


कई दिनों से मेरे मन मे ये सवाल उठ रहा था ..कि भारत ने क्रिकेट के मैदान मे दो वर्ल्ड कप जीते ..लेकिन आखिर कौनसी जीत सबसे बड़ी है....साफ ये युग अलग-अलग थे ...इसलिए दोनों की तुलना नही की जा सकती .....लेकिन फिर भी मैने आकलन करके पाया...कि 2007 में धोनी की कप्तानी में जीता गया वर्ल्ड कप की जीत भारतीय क्रिकेट के लिहाज़ से सबसे बड़ी जीत है...इसके कुछ ठोस कारण हैं.......ये सच है कि 1983 वर्ल्ड कप की जीत के पहले भारतीय टीम को ज्यादा महत्व नही दी जाती थी...लेकनि कपिल के कारनामे के बाद ..भारतीय क्रिकेट को नई पहचान मिली...और रुतबा भी...वहीं 2007 में वेस्टइंडिज़ में वन डे वर्ल्ड कप गंवाने के बाद ...भारतीय क्रिकेट को बड़ी झती पहुंची...लोग का इंटरेस्ट कम होने लगा ..हर तरफ भारतीय क्रिकेट की आलोचना हो रही थी....टीम को लेकर निरासा का माहौल था.....और अब क्रिकेट फैंस मानने लगे थे ..कि क्रिकेट ...सिर्फ समय बर्बाद करने का जरिया है...इस दौरान बीसीसीआई के मुनापे में भी कमी आई.....और भारतीय बोर्ड भारतीय फैंस के इंटरेस्ट को बनाने के लिए ...रोज़ नई बात रखता ...यहां तक कि वर्ल्ड कप के बाद तुंरत आयोजित की गई ...बांग्लादेश सीरीज़ में भी नए खिलाड़ियों को चांस दिया गया ...और सीनियर खिलाड़ियों को आराम ...बीसीसीआई को लगा कि इससे लोगों का गुस्सा शांत हो जाएया.....
भारतीय क्रिकेट के लिए हालात बेहद खराब थे......और टीम का मनोबल टूट चुका था...ऐसे समय में भारत को ट्वेंटी-20 वर्लड में शिरकत करनी थी...और सीनियर खिलाड़ियों जैसे सचिन..सौरव ..और राहुल के अपना नाम वापस लेने के बाद टीम की कमान युवा महेंद्र सिंह धोनी के कंधों पर सौंपी गई..वर्लड कप में भारत ने शुरुआत पाकिस्तान के खिलाफ जीत के साथ की .....लोगों का इंटरेस्ट खेल में लौटने लगा ....इसके बाद ...इंग्लैंड ...साउथ अफ्रीका .....और ऑस्ट्रेलिय़आ जैसी टीमों को धूल चटाने के बाद टीम इंडिया फाइनल में थी......मुकाबला फिर पाकिस्तान से था.....और भारत के सामने था ...क्रिकेट फैंस के खोए विश्वास को पाने का सुनहार मौका.......जंग आखिरी ओवर तक गई ...क्रिकेट का रोमांच अपने चरम पर पहुंचा ..और एक हाइवोल्टेज ड्रामे में ..भारत ..वर्ल्ड चैंपियन बन गया.......क्रिकेट फैस जश्न मनाने सड़को पर उतर आए...टीम का भव्य स्वागत हुआ....और भारतीय क्रिकेट एक बार फिर बुलदियों पर था.. शायद 1983 में कपिल आर्मी के साथ ऐसा ना हुआ हो ...लेकिन ...धोनी के धुरंदरों ने उस पल को एक बार फिर जीवित कर दिया....जो भारतीय फैंस ने करीब 24 साल पहले देखा था......और भारतीय क्रिकेट को भी नई जान मिल गई...टीम इंडिया तुम्हे सलाम..


रवीश बिष्ट ( लेखक धोनी आर्मी के संस्थापक हैं)

रविवार, 12 जुलाई 2009

धोनी को मिले डॉक्टरेट की उपाधि

डॉ ..... महेंद्र सिंह धोनी ?
कुछ दिनों पहले एक खबर ने ज़ोर पकड़ा ..कि धोनी बी कॉम के एक्जाम में फेल हो गए हैं.....और अब आगे की पढ़ाई उनके लिए मुशकिल हो सकती है...खास बात ये रही कि. फिछले साल धोनी और टीम इंडिया ने जमकर क्रिकेट खेला ..इस दौरान ट्रैवलिंग भी बुत ई..तो फिर एक क्रिकेटर को कहा से वक्त मिलता ...कि वो किताब खोलकर बी कॉम के एक्जाम की तैयारी करे...धोनी..भारत को लगातार सीरीज़ जीताकर वो काम कर रे हैं...जो ...कई पढ़े लिखे लोगों ने भी नही किया.....फिर भी वो चाहते हैं..कि कम से कम ..वो ग्रेजूएट तो बन जाएं...हालांकि इसके पीछे उनकी असली मंशा कुछ भी हो सकती है..भारत मे पढ़ाई लिखाई को बेहद जरुरी माना जाता है ...कि धोनी के करनामे किसी से छुपे नही है...सवालस यो उठता है कि ..जब ..सचिन तेंदुलकर ..सुनील गावस्कार ..और यहा तक की सानिया मिर्जा को भी डॉक्टरेट की उपाधि मिल सकती है.तो फिर सिर्फ दो सालों में ही टीम को बुलंदियों पर पहुंचाने वाले धोनी को क्यों नहीं.??...क्यों उनकी कॉलेज उन्हे बार-बार फेल करके सुर्खियां बटोर लेता है?...क्या रांची के सेंट जेवियर कॉलेज को नही लगता कि धोनी की शख्सियत इतनी बड़ी हो चुकी है...कि उन्हे डॉक्टरेट की मानद उपाधि से नवाज़ा जाए...धोनी जैसे खिलाड़ी किसी भी प्रदेश के लिए विभूती हो सकता है...फिर भी ...प्रदेश सरकार ने इस दिशा में कभी गंभीरता से नही सोचा ..अब ववक्त आ चुका है ...कि टीम इंडिया के कप्तान को ...उनका उचित सम्मान दिया जाए ..ताकी क्रिकेट की पढाई टॉप करने वाले धोनी को ...क्रिकेट के बाहर भी डॉक्टर धोनी के नाम से जाना जाए...

रवीश बिष्ट ( लेखक धोनी आर्मी के संस्थापक हैं)

शनिवार, 11 जुलाई 2009

लीजेंड फेडरर ने रचा इतिहास


इतिहास पुरूष हैं फेडरर


रिकॉर्ड बनते ही है टूटने के लिए औऱ जो रिकॉर्ड तोड़ता है वो इतिहास पुरूष कहलाता है। दुनिया के सबसे मंहगें गेम टेनिस में रिकॉर्ड बनाना भी मंहगा होता।
रिकार्ड 15वां ग्रैंड स्लैम जीतने के लिए रोजर फेडरर को रविवार को एंडी रोडिक के खिलाफ सवा चार घंटे तक मैराथन मुकाबला करना पड़ा। सात साल से टेनिस जगत पर राज करने वाले फेडरर ने आखिर बाजी अपने नाम की और विंबलडन में छठा और रिकार्ड 15वां ग्रैंड स्लैम खिताब जीतकर नया इतिहास रच डाला।

दुनिया में दूसरे नंबर के फेडरर ने मुश्किल घड़ी में भी धैर्य बनाए रखकर रोडिक को 5-7, 7-6, 7-6, 3-6, 16-14 से हरा दिया। अमेरिका के पीट संप्रास के 14 ग्रैंड स्लैम खिताब के रिकार्ड को पीछे छोड़ा जो टेंशन से भरे इस मैच के दौरान रायल बाक्स में उपस्थित थे। स्विट्जरलैंड के फेडरर को अमेरिका के छठी वरीय रोडिक ने कड़ी टक्कर दी। रोडिक ने पहला सेट जीता और दूसरे सेट में उनके पास एक समय चार सेट प्वाइंट थे लेकिन यहीं पर फेडरर ने ग्रास कोर्ट पर अपने अनुभव का अच्छा इस्तेमाल करके बराबरी की। रोडिक ने इसके अलावा मैच के अंतिम गेम से पहले तक कोई सर्विस नहीं गंवाई थी। यह बेजोड़ फाइनल था जिसमें अंतिम सेट 95 मिनट तक चला जो विंबलडन में नया रिकार्ड है।
27 वर्षीय फेडरर ने अब तक छह विंबलडन, पांच अमेरिकी ओपन, तीन आस्ट्रेलियाई ओपन और एक बार फ्रेंच ओपन जीता है। इस जीत से वह फिर से राफेल नडाल की जगह दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी भी बन गए हैं जिन्होंने पिछले साल यहां पांच सेट में जीत दर्ज की थी।


अपना छठा विंबल्डन खिताब जीतने के साथ ही फेडरर ने पीट संप्रास को पीछे छोड़ दिया। टेनिस के इतिहास पुरुष को यह दिग्गज खिलाड़ी संप्रास की सलामी देने की ललक ही थी, जो उन्हें 7 साल बाद आल इंग्लैंड क्लब के सेंटर कोर्ट तक खींच लाई। फेडरर द्वारा खुद उनका ही सर्वाधिक ग्रैंडस्लैम खिताब [14] जीतने का रिकार्ड तोड़ता हुआ देखने के लिए। संप्रास ने वर्ष 2002 में स्विट्जरलैंड के गैर वरीय जार्ज बास्टल के हाथों हार के बाद आल इंग्लैंड क्लब में कदम नहीं रखा था। इस अनमोल पल को अपनी यादों में सहेजने के लिए महान खिलाड़ियों व हस्तियों की लंबी कतार देखी जा सकती थी, जिनमें 1969 में चारों ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने वाले महान राड लेवर, ब्योन बोर्ग, बोरिस बेकर सहित सचिन तेंदुलकर भी पत्नी अंजलि सहित मौजूद थे। यहां तक की हर अंक पर फेडरर की पत्नी मिर्का वावरिनेक व रोडिक की जीवनसाथी ब्रूकलिन डेकर के चेहरे के हाव-भाव हर किसी को विचलित कर रहे थे। इस मैच में जीत के साथ ही फेडरर ने एक और मामले में संप्रास को पछाड़ दिया। वहीं संप्रास ने 14 ग्रैंडस्लैम खिताब के लिए 52 टूर्नामेंट में हिस्सा लिया था। संप्रास ने 2002 में अमेरिकी ओपन के रूप में 14वां ग्रैंडस्लैम खिताब जीता था। फाइनल में हमवतन आंद्रे अगासी को हराने के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कैरियर को अलविदा कह दिया था।
15 ग्रैंड स्लैम जीत कर फेडरर ने इतिहास रच तो दिया लेकिन आगे ये देखना दिलचस्प होगा की फेडरर का रिकॉर्ड तोड़ने वाला कौन टेनिस होगा ?


रजनीश कुमार
टेनिस एक्सपर्ट

टेनिस के धोनी हैं फेडरर


धोनी
आगे या
फेडरर







टेनिस के दिग्गज रोजर फेडरर नें करियर का 15वां ग्रैंडस्लैम जीतकर इतिहास रच दिया...इसी दिन ....एक और इतिहास रचा गया...भारत ने वेस्टइंडिज़ में वन डे सीरीज़ जीतकर वर्ल्ड कप की हार के कलंक को धो दिया......और इस जीत के सबसे बड़े सूत्रधार बने कप्तान महेंद्र सिंह धोनी .वहीं फेडरर की जीत कई माइनों में अहम थी...वो पिछले साल विंबल्डन में चूक गए थे....लेकिन इस बार पूरे खेल में उन्होने अपना कॉन्सनट्रेशन बनाए रखा ..जैसे .धोनी हर पल ..मैच में अपनी पकड़ कमज़ोर नही होने देते....फेडरर... धोनी की ही तरह आक्रामक होने के बाद भी कभी ये दिखाने की कोशिश नही करते ...कि उन्होने विरोधी को पस्त कर दिया है...या किसी भी प्रकार का अंहकार ...उनसे काफी दूर रहता है...याद करिए ..साल 2007 के उस पल को जब माही ने भारत को ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप में जीत दिलाई थी...मैच के आखिरी रोमांचक पलों में भी धोनी के माथे पर चिंता की एक भी लकीर नही थी...ऐसा ही कुछ फेडरर के साथ भी था...वो भी बस रॉडिक की हर सर्व का बेहतरी से जवाब दे रे थे...धोनी की तरह उन्हे भी पता था..की गलती दूसरे खेमे से होगी.....दरअसल फेडरर ने भी धोनी की तरह कामयाबी की सीढ़ी को बड़ी तेज़ से चढ़ा है...अपने सात साल के करियर में वो 15 ग्रैंड स्लैम जीत चुके हैं...वही धोनी का रिकॉर्ड कम समय में और भी शानदार है....अपने डेब्यू के पांच साल बाद ..धोनी ने हर मिशन इंपॉसिबल को पॉसिबल किया...वर्ल्डकप का ताज़ दिलाया...आईसीसी के नंबर वन प्लेयर बने....आईसीसी के बेस्ट कप्तान भी बने...100 करोंड़ के देश में जहां ..उम्मीदों का पहाड़ हमेशा टीम इंडिया के कप्तान पर होता है...उस ज़िम्मेदारी को धोनी से बेहतर शायद ही किसी ने अंजाम दिया हो..वहीं फेडरर भी नडाल से मिल रही लगातार टक्कर से आलोचनाओं के घेरे में थे....लेकिन विंबल्डन 2009 जीतकर उन्होने साबित कर दिया ..कि टेनिस के कोर्ट पर ...वो भी धोनी जैसे धुरंदर ही है....

रवीश बिष्ट ...( धोनी-आर्मी के संस्थापक)
क्रिएटिड बाय रजनीश कुमार

बुधवार, 1 जुलाई 2009

सपना सच हुआ जब ‘हम लंदन गए ’

Rishabh
ऋषभ शर्मा से खास मुलाकात " रजनीश कुमार के साथ"

“4 साल पहले जब मैं इंडिया टीवी में काम करता था तो उस वक्त मैंने एक सपना देखा कि मैं इंग्लैंड जाउंगा औऱ क्रिकेट के मक्का लार्ड्स में लाइव मैच देखने का आनंद उठाउंगा इसके साथ साथ पीटीसी भी जरूर मारुंगा।“ ये लाइनें कहते हुए लाइव इंडिया के वरिष्ठ खेल संवाददाता ऋषभ शर्मा ने हमें बताया कि लंदन वाकई सपनों का शहर है।"

कहतें है कि किताबें शक पैदा करती है आप जितना पढ़ते है उतनी इच्छाओं औऱ सपनों में जीना शुरू कर देते है। लेकिन कभी-कभी हर ख्वाब हकीकत में बदल जाता है ।हर सपना सच हो जाता है ऐसा ही कुछ हमारे ऋषभ भाई के साथ हुआ।

लाइव इंडिया की ओर ऋषभ शर्मा ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप कवर करने के लिए इंग्लैंड गए। ये लाइव इंडिया के लिए न कि बल्कि ऋषभ शर्मा के लिए ऐतिहासिक मौका था क्योंकि लाइव इंडिया के इतिहास में कोई भी रिपोर्टर विदेश दौरे पर नहीं गया था। हालांकि ऋषभ शर्मा लंदन जाने से पहले काफी मेहनत की. जिसका परिणाम उन्हें मिला औऱ वो लंदन मैच कवर करने के लिए चले गए। हालांकि टीम इंडिया का सफर टूर्नामेंट में जल्द खत्म होने के काऱण भारत में 20-20 वर्ल्ड कप क्रेज नहीं रह गया था। लेकिन फिर भी ऋषभ भाई ने मेहनत करके वहां की साइड एंगल स्टोरिंयां भेज कर इंग्लैंड की सैर हमें दिल्ली में बैठे बिठाए ही करवा दी।
सबसे पहले मैं उन ऐतिहासिक जगहों से आपकी परिचय करवा दूं जहां की यादें समेटे ऋषभ भाई कहते है कि “हम लंदन गए थे”
सबसे पहले रॉबिन हुड की कहानियों की स्टोरी हमने ऑनएअर की
उसके बाद टॉवर ब्रिज का जायजा क्रिकेट के मक्का लार्ड्स का जायजा फिर शरलॉक हॉम्स ऑल्डेस्ट बार इन नॉटिंघम मैडम तुसाद इसके अलावा की कुछ स्टोरियों को भी ऋषभ भाई ने कवर की । इन सभी स्टोरियों को देख कर ऐसा लगता है कि हां ऋषभ भाई लंदन गए थे।

लंदन और ट्वेंटी-20 की यादगार लम्हें समेटे आखिर ऋषभ भाई वापस वतन लौटे तो फिर वही रोजमर्रे की जिंदगी फिर से याद आ गई। खैर लंदन की यादें अभी भी जेहन मे तारो ताजा थी। मेरे जेहन में एक ही सवाल था जो मैं न जाने ऋषभ भाई से कितनी बार पूछ चुका था । जब वो लंदन में थे तब भी मैं फोन पर पूछा करता था कि लार्ड्स में बैठकर मैच देखना और लंदन से पीटीसी भेजना कैसा लगता ? न जाने मैं कितनी बार ये सवाल पूछ चुका था फिर भी उनके जवाबों से जब मेरा दिल नहीं भरा तो मैंने एक दिन फिर पूछा। मगर ऋषभ भाई का वही जवाब “मानों हर सपना जल्दी जल्दी सच हो रहा है और ये लम्हें जाहिर नहीं किए जातें है बल्कि महसूस किए जाते है।“
खैर उनकी बातों को सुनकर ऐसा लगता है कि ऐसे लम्हें जाहिर नहीं बल्कि ये लम्हें एक एहसास की तरह होता है जिन्हें शायद महसूस ही किया जाता हो ।
अपने सवालों का पुलिंदा लिए मैं ऋषभ भाई के सामने हाजिर हो गया ऋषभ भाई भी अपनी लंदन टूर की कहानियों की जरिए मेरे सवालों के जवाब दे रहे थे उन जवाबों में एक बात कॉमन थी कि हम लंदन गए थे औऱ हो भी क्यों न ।
हर स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट का सपना होता है कि वो फॉरेन टूर कवर करे और वो भी खासकर इंग्लैंड ।
मैंने आज किसी के हकीकत को अपनी आंखो के सामने सच होता देखा है । मेरे दिल में एक ही सवाल उठता है कि क्या सच में सपने जब हकीकत का रूप ले लेता है तो बयां करना मुश्किल हो जाता है ?
ऋषभ भाई अपने लंदन यात्रा को हर तरीके से सफल बनाया है चाहे वो प्रोफेसनली हो .या पर्सनली हो ।

जब पर्सनली बात हुई तो मुझे एक बात याद आई कि जब ऋषभ भाई ऑफिस ज्वाइन किया तो बहुत से लोगों ने आकर ऋषभ भाई को हैलो बोला। हैलो बोलने वालों में कुछ ऐसे भी लोग थे जो इससे पहले शायद आज तक ऋषभ भाई को हैलो नही बोला था । खैर ऐसे मौके पर सभी ऐसे व्यवहार करते है कि जैसे कि हम आपके वर्षों से हिमायती रहे हैं।
बहुत से लोग अपने अपने सवालों की बौछार किए जा रहे थे इन्ही सवालों की आंधी में मुझे एक सवाल सुनाई दिया कि “ऋषभ लंदन जाकर गोरी मेम के साथ मस्ती किया या नहीं।“
ऋषभ भाई इन मामलों में साफ छवि के व्यक्ति है उन्होंने इन सवालों को बड़े आसानी के साथ हंसते हुए टाल दिया औऱ कुछ शब्दों में जवाबों के रूप में बोला.. कि यार मैं वहां लाइव इंडिया का काम करने गया था और जब मैं अगली बार पर्सनली विजिट पर जाउंगा तो जरूर ट्राई करुंगा।

लंदन की सड़कों पर खुली बसों में आनंद लेते हुए ऋषभ शर्मा अपनी जिंदगी के बेहतरीन लम्हों में से एक मानते हैं। फिल्मों में तो शायद हमने न जानें कितनी बार ऐसा दृश्य देखा है खासकर मुझे वो रहना है तेरे दिल में फिल्म में आर माधवन बीयर पीते हुए खुली बस में घूमता है।
खैर जब सपना जब हकीकत में बदलता है तो किसी फिल्म का सीन नहीं बल्कि खुद के रोमांच से भऱे पल याद आतें है।
ऐसे बहुत सारे लम्हों को याद करके ऋषभ शर्मा एक ही बात कह रहें हैं औऱ शायद आगे भी कहेंगे कि औऱ कहें भी क्यो न.. "
जब हम लंदन गए थे।"