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खेल से खेल तक
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मंगलवार, 11 जनवरी 2011

फंस गए ओबामा नहीं, फंस गए रवीश !

IBN7 की स्पोर्ट्स डेस्क पर बैठे ..एक इंटर्न ने मुझसे पूछा कि ...सर आप क्या पहले से ही रिपोर्टर बनना चाहते थे.....मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं..फिर भी मैंने ... हां कहते हुए सिर हिला दिया......तो उसका अगला सवाल था ..कि आपने कब इसके बारे में सोचा .....उसका ये सवाल सुनते ही मैंने अपने होंठ दबा लिए ..और मैं सीधे ...अपने बचपन में पहुंच गया.....मेरी बड़ी दीदी ने मेरा नाम रवीश इसलिए रखा ..क्योंकि .....जब स्कॉवड्रन लीडर राकेश शर्मा चांद पर गए थे..तो उस मिशन के विंग कमांडर रवीश मलहोत्रा थे ...क्योंकि राकेश मेरे बड़े भाई का नाम था ..इसलिए मेरा नाम रवीश रख दिया गया....और मुझे बचपन से ही ये बताया गया कि जब कोई पूछे कि क्या बनना है ..तो मुझे कहना है SUADOURN LEADER .....हांलाकिं मुझे तो पता भी नहीं था कि ये होता क्या है ....फिर भी घर पर मेहमान आते और मेरा जवाब यही होता ....थोड़ा बड़ा होने पर मेरा इंटरेस्ट क्रिकेट की तरफ बड़ गया .....पापा से बैट लाने को जिद की ..तो अगले दिन वो बैट ले आए और कहने लगे कि तू डेविड बून है........ मैंने सोचा कि सचिन के बाद ..अगला नाम मेरा ही होगा ....पड़ोस में दो-तीन लोगों ने मेरे खेल की तारीफ भी कर दी..बस क्या था ...मुझे तो लगा कि ..मेरा जन्म ही क्रिकेट के लिए हुआ है.......हमने अपनी टीम बना ली ..बैट मेरा था तो कप्तान भी मैं बन गया....अब हर संडे को दूसरे मोहल्ले की टीम से मैच होता .....जल्द ही मुझे समझ आने लगा ..कि क्रिकेट मेरे बस की बात नहीं.....लेकिन हां पड़ोस के अंकल ने मुझे कॉमेंट्री करते हुए सुना और कहा - तू कॉमेन्टेटर बनेगा ...

इसके बाद जी...लॉन टेनिस की धुन सवार हो गई ..बोरिस बेकर ने विंबल्डन जीता .....और मुझ पर उसका जूनुन सवार हो गया.....फिर आंद्रे अगासी ..जिम कूरियर ..पीट सैम्प्रास.,..मेरे सपने में आने लगे......बैडमिटन के रैकेट से ही मैं टेनिस खेलने लगा..जब मेरी दीदी ने देखा कि मैने रैकेट खराब कर दिया है ..तो उन्होंने ...रैकेंट ही छुपा दिया.....कई दिनों तक ढूंडा लेकिन नहीं मिला ...तो मैंने सोचा छोड़ों ..कुछ नया करते हैं .....
1994 फुटबॉल वर्ल्ड कप शुरु हो गया.....और मोहल्ले के बड़े भाई लोग फुटबॉल की बातें करते थे ..अमर उजाला में फुटबॉलर्स की फोटो छपती थी....रोमारियो..बौजियो....सिलाइची..ना जाने क्या क्या....

और अब मैं भी पूरी तरह से ठान चुका था कि ...मुझे मैराडोना बनना है..पापा फुटबॉल ले आए....खेल शुरु हुआ ....हमारे घर में एक गैलरी थी...और उसकी दीवारों का सारा सीमेंट मैनें फुटबॉल मार-मार का निकाल दिया था ...उसके बाद मेरे घर वालों ने मेरी धुनाई करके ..मेरे फुटबॉलर होने का सारा भूत भी निकाल दिया.....
अब मैं क्या करता .....घर में टीवी देखता था .....दुरदर्शन पर परमवीर चक्र दोबारा शुरु हुआ ..बहुत जोश आया.....मन किया बड़ा होकर फौजी बनना है ...मेरे मामा भी कर्नल थे....वो तो मेरे हीरो हो गए....किताब में अब्दुल हमीद का चैपटर पढ़ा तो बस देशभक्ती का क्रेज हो गया........एक दिन मम्मी के साथ आर्मी कैंटिन गया...
वहां एक लियो की टॉय गन रखी थी ...गन बहुत बड़ी थी ....लेकिन बिलकुल असली थी .....मैंने मम्मी से कहा मुझे ये चाहिए ...मंहगी होने की वजह से मम्मी ने मना कर दिया.....मैं रोता रहा ...फिर मेरे मामा आए ..और उन्होने वो गन खरीदकर मुझे दे दी.....मैं सोता भी उसी गन के साथ था ..और स्कूल के बाद उसी के साथ खेलता.....स्कूल में भी कोई पूछता कि क्या बनोगे तो मेरा जवाब लेफिट्नेंट ही होता....
देखते देखते मेरे पापा के मार्गदर्शन में मेरा जनरल नॉलेज बहुत तेज हो गया....मैं स्कूल की क्विज को टॉप करने लगा...प्रिंसिपल ने स्टेज पर बुलाकर मुझे ईनाम दिया..और कंधे पर हाथ रखकर कहा ..आईएस बनेगा !......यानी एक और नया करियर ...इस दौरान प्राइम स्पोर्टस नाम से स्पोर्टस चैनल आ चुका था ..और उसमें हम लोग चारू शर्मा को माइक लेकर ...बोलते हुए देखते थे....मैंने भी अखबार और कागज से वैसा ही माइक बनाया....और उसे अपनी स्टडी टेबल के पास रखा करता था ..जैसे ही पठाई के बीच में कोई नहीं होता था ..मैं उसे हाथ में लेकर कॉमेंट्री करता था....लेकिन फिर भी दिमाग मे था कि आईएएस बनना है ....एक दिन हमारे उतराखंड की मंत्री इंदिरा ह्रदेश से मुलाकात हुई ..वो मेरी मम्मी को जानती थी..तो मझसे पूछा कि क्या बनोगे ..मैंने तपाक से जवाब दिया आईएएस .....वो चौंक गई ...बोली तुम जानते हो आईएएस क्या होता है...इसके लिए बहुत मेहनत करनी होती है ...मैंने दिल में सोचा पागल है ये ..मेरे बारे में कुछ नहीं जानती.....जब बन जाउंगा तब पता लगेगा......खैर वो तो चली गई लेकिन इस दौरान मुझे साइंस में इंटरेस्ट आने लगा .....मेरे सभी भाई-बहन सांस स्टूडेंट थे ..इसलिए घर में साइंस का माहौल था....फिजिक्स पढ़कर मुझे लगा कि साइंटिस्ट बनना क्या बुरा है....फिर उन दिनों आईआईटी वाले लोग आईएस बन रहे थे...तो लगा पहले इंजिनियरिंग ..फिर आइएएस..क्या आईडिया था.....12वीं खत्म हुई इंजिनिरिंग की कोचिंग शुरु.....पहले दो महीने बाद लग गया....नहीं यार ..मुझे नहीं करनी ...इंजिनियरिंग ....ङर वाले 50 हजार के करीब फीस भर चुके थे ..इसलिए कोचिंग चलती रही ..लेकिन दिल कही और था....खैर जगह-जगह काउंसलिंग के लिए गया.....लेकिन उतराखंड के पहाड़ों में बसे कॉलेजों से मैने तौबा कर ली.....और साफ-साफ कह दिया ..कि मुझे इंजिनियर नहीं बनना .....मुझे खबी भी पहाड़ों में जिंदगी बिताना पसंद नहीं था ...इसलिए मम्मी से कहा कि आपने जो पैसे कोचिंग में खर्च किए हैं वो वापस कर दूंगा.....इसके बाद मैंने कॉलेज में एडमिशन ले लिया....कॉलेड में एडमिशन के दौरान पहला साल तो ऐसे ही गुजर गया....अब कोई पूछता कि क्या बनना है ..तो मैं कहता पहले बीएसी कर लूं फिर सोचूंगा....सच कहं मैं उस दौरान लोगों से कतराने लगा था ....क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई सवाल नहीं होता था ...और मेरे पास कोई जवाब नही था...फर्स्ट ईयर तो ऐसे ही गुजर गया..सेकेंड ईयर में मैंने..फिर से क्विज ....भाषण ..जनरल नॉलेज शुरु कर दिया.....मैं मिमिकरी अच्छी करता था ..इसलिए कॉलेज में नाटक में भाग लेना का मुझे ..चांस मिल गया.,....अब मैं खुद नाटक लिखता ..और उसमें एक्ट भी करता.....कभी डॉक्टर बनता ..तो कभी गांधी जी.....अब दिन कट रहे थे.....लेकिन लक्ष्य का पता नही था....
मेरे पापा कि बहुत तमन्ना था कि मैं फौज में जाऊं ..उनका कहना था ...कि इसमें ट्रेनिंग के दौरान भी तनख्वाह मिलती है ..और ऑफिसर की लाइफ बेस्ट है......मैंने CDS का एक्जॉम दिया.....और क्वालिफाइ भी कर लिया....लेकिन फिर भी दिल कह रहा था...कि अगर फौज में जांगा ..तो मुझे कौन जानेगा....भगवान ने सुन ली ..और मैं फाइनल राउंड में बाहर हो गय़ा....पापा बहुत निराश हुए......लेकिन मुझे अब समझ में आ रहा था.....कि क्या करना है.... कॉलेज के नाटक में मैं रिपोर्टर बना.....और लोगों ने उसकी बहुत तारीफ की ...सबने कहा तुम रिपोर्टर बनो......मैंने गढवाल यूनिवर्सि का फॉर्म भरा ..हजारों स्टूडेंट्स में से मुझे तीसरा स्थान मिला...अब घर छोड़ने का वक्त आ गया.....लेकिन फिर वही चक्कर पहाड़ में कॉलेज था .और मुझे वहां नहीं रहना था ...मैंने फिर मना कर दिया.....अगले साल आईएमएमसी और भारतीय विघा भवन..और जामिया का फॉर्म लाया...लेकिन किस्मत ले गई....भारतीय विघा भवन....पापा ने रिजल्ट देखा ..फिर कुछ देर सोचा ..और बोले ...क्या बनेगा तू ? मैंने कहा रिपोर्टर......पापा बोले-- ठीक है तू यही बन ..लेकिन हां ...ये सोच ले ..कि तुझे नंबर वन बनना है ....आज मैं रिपोर्टर तो बन गया....और टीवी में देखने के बाद मेरे पापा को यही लगता कि ....अगर मैं रिपोर्टर बन सकता हूं ..तो कोई भी बन सकता है ....

बुधवार, 1 जुलाई 2009

सपना सच हुआ जब ‘हम लंदन गए ’

Rishabh
ऋषभ शर्मा से खास मुलाकात " रजनीश कुमार के साथ"

“4 साल पहले जब मैं इंडिया टीवी में काम करता था तो उस वक्त मैंने एक सपना देखा कि मैं इंग्लैंड जाउंगा औऱ क्रिकेट के मक्का लार्ड्स में लाइव मैच देखने का आनंद उठाउंगा इसके साथ साथ पीटीसी भी जरूर मारुंगा।“ ये लाइनें कहते हुए लाइव इंडिया के वरिष्ठ खेल संवाददाता ऋषभ शर्मा ने हमें बताया कि लंदन वाकई सपनों का शहर है।"

कहतें है कि किताबें शक पैदा करती है आप जितना पढ़ते है उतनी इच्छाओं औऱ सपनों में जीना शुरू कर देते है। लेकिन कभी-कभी हर ख्वाब हकीकत में बदल जाता है ।हर सपना सच हो जाता है ऐसा ही कुछ हमारे ऋषभ भाई के साथ हुआ।

लाइव इंडिया की ओर ऋषभ शर्मा ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप कवर करने के लिए इंग्लैंड गए। ये लाइव इंडिया के लिए न कि बल्कि ऋषभ शर्मा के लिए ऐतिहासिक मौका था क्योंकि लाइव इंडिया के इतिहास में कोई भी रिपोर्टर विदेश दौरे पर नहीं गया था। हालांकि ऋषभ शर्मा लंदन जाने से पहले काफी मेहनत की. जिसका परिणाम उन्हें मिला औऱ वो लंदन मैच कवर करने के लिए चले गए। हालांकि टीम इंडिया का सफर टूर्नामेंट में जल्द खत्म होने के काऱण भारत में 20-20 वर्ल्ड कप क्रेज नहीं रह गया था। लेकिन फिर भी ऋषभ भाई ने मेहनत करके वहां की साइड एंगल स्टोरिंयां भेज कर इंग्लैंड की सैर हमें दिल्ली में बैठे बिठाए ही करवा दी।
सबसे पहले मैं उन ऐतिहासिक जगहों से आपकी परिचय करवा दूं जहां की यादें समेटे ऋषभ भाई कहते है कि “हम लंदन गए थे”
सबसे पहले रॉबिन हुड की कहानियों की स्टोरी हमने ऑनएअर की
उसके बाद टॉवर ब्रिज का जायजा क्रिकेट के मक्का लार्ड्स का जायजा फिर शरलॉक हॉम्स ऑल्डेस्ट बार इन नॉटिंघम मैडम तुसाद इसके अलावा की कुछ स्टोरियों को भी ऋषभ भाई ने कवर की । इन सभी स्टोरियों को देख कर ऐसा लगता है कि हां ऋषभ भाई लंदन गए थे।

लंदन और ट्वेंटी-20 की यादगार लम्हें समेटे आखिर ऋषभ भाई वापस वतन लौटे तो फिर वही रोजमर्रे की जिंदगी फिर से याद आ गई। खैर लंदन की यादें अभी भी जेहन मे तारो ताजा थी। मेरे जेहन में एक ही सवाल था जो मैं न जाने ऋषभ भाई से कितनी बार पूछ चुका था । जब वो लंदन में थे तब भी मैं फोन पर पूछा करता था कि लार्ड्स में बैठकर मैच देखना और लंदन से पीटीसी भेजना कैसा लगता ? न जाने मैं कितनी बार ये सवाल पूछ चुका था फिर भी उनके जवाबों से जब मेरा दिल नहीं भरा तो मैंने एक दिन फिर पूछा। मगर ऋषभ भाई का वही जवाब “मानों हर सपना जल्दी जल्दी सच हो रहा है और ये लम्हें जाहिर नहीं किए जातें है बल्कि महसूस किए जाते है।“
खैर उनकी बातों को सुनकर ऐसा लगता है कि ऐसे लम्हें जाहिर नहीं बल्कि ये लम्हें एक एहसास की तरह होता है जिन्हें शायद महसूस ही किया जाता हो ।
अपने सवालों का पुलिंदा लिए मैं ऋषभ भाई के सामने हाजिर हो गया ऋषभ भाई भी अपनी लंदन टूर की कहानियों की जरिए मेरे सवालों के जवाब दे रहे थे उन जवाबों में एक बात कॉमन थी कि हम लंदन गए थे औऱ हो भी क्यों न ।
हर स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट का सपना होता है कि वो फॉरेन टूर कवर करे और वो भी खासकर इंग्लैंड ।
मैंने आज किसी के हकीकत को अपनी आंखो के सामने सच होता देखा है । मेरे दिल में एक ही सवाल उठता है कि क्या सच में सपने जब हकीकत का रूप ले लेता है तो बयां करना मुश्किल हो जाता है ?
ऋषभ भाई अपने लंदन यात्रा को हर तरीके से सफल बनाया है चाहे वो प्रोफेसनली हो .या पर्सनली हो ।

जब पर्सनली बात हुई तो मुझे एक बात याद आई कि जब ऋषभ भाई ऑफिस ज्वाइन किया तो बहुत से लोगों ने आकर ऋषभ भाई को हैलो बोला। हैलो बोलने वालों में कुछ ऐसे भी लोग थे जो इससे पहले शायद आज तक ऋषभ भाई को हैलो नही बोला था । खैर ऐसे मौके पर सभी ऐसे व्यवहार करते है कि जैसे कि हम आपके वर्षों से हिमायती रहे हैं।
बहुत से लोग अपने अपने सवालों की बौछार किए जा रहे थे इन्ही सवालों की आंधी में मुझे एक सवाल सुनाई दिया कि “ऋषभ लंदन जाकर गोरी मेम के साथ मस्ती किया या नहीं।“
ऋषभ भाई इन मामलों में साफ छवि के व्यक्ति है उन्होंने इन सवालों को बड़े आसानी के साथ हंसते हुए टाल दिया औऱ कुछ शब्दों में जवाबों के रूप में बोला.. कि यार मैं वहां लाइव इंडिया का काम करने गया था और जब मैं अगली बार पर्सनली विजिट पर जाउंगा तो जरूर ट्राई करुंगा।

लंदन की सड़कों पर खुली बसों में आनंद लेते हुए ऋषभ शर्मा अपनी जिंदगी के बेहतरीन लम्हों में से एक मानते हैं। फिल्मों में तो शायद हमने न जानें कितनी बार ऐसा दृश्य देखा है खासकर मुझे वो रहना है तेरे दिल में फिल्म में आर माधवन बीयर पीते हुए खुली बस में घूमता है।
खैर जब सपना जब हकीकत में बदलता है तो किसी फिल्म का सीन नहीं बल्कि खुद के रोमांच से भऱे पल याद आतें है।
ऐसे बहुत सारे लम्हों को याद करके ऋषभ शर्मा एक ही बात कह रहें हैं औऱ शायद आगे भी कहेंगे कि औऱ कहें भी क्यो न.. "
जब हम लंदन गए थे।"