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खेल से खेल तक

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

सचिन का महाशतक



साल 2011 में सचिन को अपना महाशतक बनाने के लिए अब सिर्फ एक ही मौका मिलेगा ... और वो होगा मेलबर्न में खेला जाने वाला बॉक्सिंग-डे टेस्ट। वैसे अगर मेलबर्न के मैदान पर सचिन के नाम मौजूद रनों के आंकड़ों को देखा जाए ... तो उम्मीद की जा सकती है ... कि महाशतक का जश्न ज़्यादा दूर नहीं है।

खत्म होगा फैंस का इंतजार
मेलबर्न में जमकर मनेगा जश्न
क्योंकि,
सचिन के बल्ले से निकलेगा
'शतकों का महाशतक'


इन लम्हों के  देखकर क्रिकेट की दुनिया के साथ साथ सचिन भले ही निराशा के भंवर में डूब गए थे...लेकिन वक्त की बयार ने ऐसी करवट ली...जिसके बाद ये लम्हें अब शायद कभी देखने को ना मिले...जी हां लगातार कई महीनों से अर्धशतक और शतक के बीच अपना विकेट गंवाकर... पवेलियन लौटते सचिन के बोझिल कदमों.. और निराश चेहरों का बोझ ..तो फैंस ने की बार ढोया...लेकिन अब यहीं निराशा आशा की ऐसी किरण में बदलने वाली है..जिसे देख सबकी जुबां से यही निकलेगा...महाशतकवीर सचिन तुम महान हो... क्रिकेट की दुनिया के इस भरोसे की बुनियाद खुद सचिन का वो रिकॉर्ड है...जो महाशतक के पूरा होने की गवाही दे रहा है..मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में सचिन ने अब तक कुल 4 टेस्ट मैच खेले हैं...जिनमें उन्होंने 43 की औसत से 344 रन बनाने में कामयाब रहें हैं...तो वहीं इस मैदान पर सचिन के बल्ले ने एक बार शतक के साथ साथ दो बार अर्धशतक का भी स्वाद चखा ...
1999-2000 के ऑस्ट्रेलियाई दौरे में सचिन ने इस मैदान पर 116 रनों की यादगार पारी खेली थी... ये आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि सचिन अपने 22 साल के क्रिकेट करियर में मेलबर्न के ग्राउंड पर खूब रन बटोरे...अब जब सचिन महाशतक का ट्रेलर प्रैक्टिस मैच में 92 रनों की पारी खेलकर दिखा चुके हैं..तो हर कोई महाशतक के जश्न की तैयारी में लग चुका है...क्योंकि .सचिन कंगारूओं के घर में रनों का लावा जो उगलना शुरू कर दिया ...मेलबर्न मैदान में सचिन के ऐतिहासिक आंकडे और प्रैक्टिस मैच में शानदार 92 रन इतना बताने के लिए काफी है...कि जल्द ही क्रिकेट की दुनिया  मास्टर के बल्ले से महाशतक का दीदार करने वाली है...तो बस तैयार हो जाइए...महाशतक के जश्न में डूबने के लिए...


रजनीश कुमार
खेल पत्रकार

महाशतक पर महासट्टा



सचिन के महाशतक पर महासट्टा

सचिन की शक्सियत पर अगर कंगारू रिसर्च ने मुहर लगा दी है ... तो वहीं क्रिकेट के खेल में सचिन की महानता पर चार चांद लगाने वाले ... महाशतक पर सट्टेबाज़ पैसा लगाते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक अकेले इस बात को लेकर ... कि सचिन का सौंवा शतक कब बनेगा ... दुनिया भर में करीब 5000 करोड़ का सट्टा लग सकता है।


दुनिया के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के महाशतक पर...10 या 20 लाख का नहीं...बल्कि पूरे 2000 करोड़ का महासट्टा लग चुका है...चौंक गए ना आप...लेकिन ऑस्ट्रेलियाई सरमजीं पर सचिन के शतक को भुनाने में सटोरिये जी जान से लग चुके हैं...यही वजह है कि बॉक्सिंग डे के 4 दिन पहले ही..सट्टेबाजी की दुनिया महाशतक पर 2000 करोड़ का सट्टा खेल चुकी है...इतना ही नहीं एक अनुमान के मुताबिक टेस्ट शुरू होने तक सट्टा 5000 करोड़ तक पहुंच जाएगा... ऐसा पहली बार हो रहा है कि किसी खिलाड़ी के एक शतक पर ....करोड़ों का दांव खेला जा रहा है....ऑस्ट्रेलियाई सरजमीं पर सचिन के बल्ले की आग को देखते हुए हर किसी की जुबां पर सिर्फ यही है कि...अब खत्म हो जाएगा महाशतक का इंतजार...सचिन के महाशतक पर ऐतिहासिक सट्टा लगाने वाले सटोरियों ने महाशतक पर जहां दोगुना भाव खोल रखा है तो वहीं...साल 2011 में सचिन के आखिरी टेस्ट को लेकर भी  उन दांव लगाया जा रहा है...सटोरियों ने महाशतक के अलावा ...इस बात पर रेट ओपन किया है कि क्या सचिन अपने 2011 के आखिरी टेस्ट यानि मेलबर्न में ही शतकों के महाशतक का इंतजार खत्म कर पाएंगे ? 
12 मार्च, 2011 को साउथ अफ्रीका के खिलाफ वर्ल्डकप मुकाबले में...सचिन के बल्ले से निकले 99वें शतक के लगभग 9 महीनों के बाद ....सटोरियों ने एक बार फिर ऐतिहासिक 2000 करोड़ का सट्टा खेल ...साल का सबसे बड़ा रिस्क ले लिया...ऐसे में अगर सचिन महाशतक का इंतजार अगर खत्म कर देते हैं तो फिर सटोरियों की चांदी होनी तय है... क्योकि सचिन के बल्ले से रनों की बरसात..सटोरियों पर भी करोड़ों की बरसात करवाएंगे....क्योंकि ये है महाशतक पर सटोरियों का महासट्टा।


रजनीश कुमार
खेल पत्रकार

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

धोनी-साक्षी का प्यार


Dhoni and Sakshi Rawat’s Love Story

टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की शादी को यूं तो 1 साल से भी ज्यादा का वक्त हो गया है... लेकिन उन्हें एक बार फिर अपनी पत्नी साक्षी से इश्क हो गया है... जिसका नज़ारा रांची में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान देखने को मिला... इस प्रोग्राम में साक्षी की कुछ पलों की जुदाई से धोनी परेशान हो उठे । धोनी की बेकरारी का आलम ये था कि पूरे प्रोग्राम के दौरान उनकी नज़रें साक्षी को ही तलाशती रही।  


जीत जिसका जश्न है...कामयाबी जिसकी फितरत...वो जब करता है मोहब्बत... तो दुनिया कहती है...ये इश्क तो माही का है...जी हां दुनिया के दबंग कप्तान और टीम इंडिया के हैडसम हंक महेंद्र सिंह धोनी को एक बार फिर हुआ है इश्क...ऐसा इश्क जिसकी दूरियां धोनी को बर्दाश्त नहीं हो रही...यूं तो धोनी सात जन्मों तक साक्षी का साथ निभाने का वादा कर चुके हैं...लेकिन जवां दिलों की धड़कन धोनी जब अपने शहर रांची में...झारखंड सरकार की ओर से आयोजित ..राष्ट्रीय खेल विजेताओं के सम्मान समारोह में पहुंचे...तो यहां धोनी को अपनी पत्नी साक्षी की दूरियां भारी पड़ रही थी...मंच पर धोनी साक्षी से दूर क्या बैठे...खुद साक्षी की भी हालत धोनी से जुदा नहीं थी...  small montage of dhoni with sakshi ye duriyan
सम्मान समारोह में मस्ती के मूड में पहुंचे धोनी आखिरकार कब तक अपनी महबूबा और संगिनी साक्षी से दूर रहते.. फैंस की भीड़ के बावजूद भी दोनों आंखों ही आंखों से इशारा करने लगे..आखिरकार.एक वक्त आया जब माही  अपने जगह से उठकर साक्षी के पास जाने को मजबूर हो गए...धोनी जैसे ही अपने पत्नी के पास पहुंचे...साक्षी भी कहां पीछे रहने वाली...मंच पर वो कभी धोनी को छेड़ती तो कभी...उनके कानों में कुछ बातें कहकर....खूब हंसती...क्योंकि वो भी धोनी से बेइंतहां मोहब्बत जो करती हैं...कहानी यहीं खत्म नहीं हुई...सम्मान समारोह में धोनी ने साक्षी को इंप्रेस करने का कोई भी मौका नहीं गंवाया...माही कभी साक्षी के लिए ढोल बजाते नजर आए...तो कभी बैड के साथ ,हाथ में माइक थामे, गाना गुनगुनाते दिखाई दिए
अब भला साक्षी धोनी से कहां पीछे रहने वाली थी.. उन्हें भी अपनी मोहब्बत का इजहार जो करना था......tere ishq ishq main haye tere ishq main बहरहाल वर्ल्डकप चैंपियन कप्तान धोनी की हर बातें जगजाहिर है...चाहें वो उनके खेलने का अंदाज हो या फिर उनकी प्रेम कहानी...फैंस तो सिर्फ इतना ही चाहते हैं कि धोनी का इश्क यूं ही परवान चढ़ता रहे...क्योंकि माही का हर अंदाज उन्हें खूब भाता है।

रजनीश कुमार
स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट
http://www.youtube.com/watch?v=HRBi6z-syj0

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

भारत 28 साल बाद फिर बना विश्व चैंपियन

धोनी जैसा कोई नहीं
भारत ने 28 साल बाद क्रिकेट विश्व कप जीत लिया है. श्रीलंका के 274 रनों का पीछा करते हुए भारत ने छह विकेट गँवाकर ये मैच अपने नाम कर लिया.

भारतीय क्रिकेट टीम कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने छक्का मार कर क्रिकेट विश्व कप भारत के नाम किया.
और इस जीत के साथ ही भारत के कई शहरों से जश्न की ख़बरें आने लगीं. मुबंई से लेकर सिलिगुड़ी तक क्रिकेट प्रेमी सड़कों पर उतर आए.

उधर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने टीम के सभी खिलाड़ियों को एक-एक करोड़ रुपए और चयनकर्ताओं को 25-25 लाख रुपए देने का ऐलान किया.

भारत और श्रीलंका के बीच फ़ाइनल मुक़ाबला देखने पहुंची राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने रविवार को भारतीय टीम को राज भवन में एक चाय पार्टी का निमंत्रण दिया है.

इसके अलावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भारतीय क्रिकेट टीम की जीत पर बधाई दी है.

मैच का हाल

भारत की जीत में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और गौतम गंभीर ने एक अहम भूमिका निभाई. धोनी ने 79 गेंदों में 91 रन बनाकर नॉट आउट रहे जबकि गंभीर 97 रन बनाकर वह तिसारा परेरा की गेंद पर बोल्ड हुए.

शुरुआती झटकों के बाद गौतम गंभीर और विराट कोहली मिलकर पारी को संभाल रहे थे इस साझेदारी की बदौलत भारत ने अपने 100 रन भी पूरे कर लिए थे.

लेकिन 22वें ओवर में विराट कोहली दिलशान की गेंद पर अपना विकेट गंवा बैठे. उन्होंने 49 गेंदों में 35 रन बनाए.

इससे पहले भारत की पारी जैसे ही शुरु हुई तो पहले ही ओवर में लसित मलिंगा की गेंद पर वीरेंदर सहवाग एलबीडब्ल्यू आउट हो गए. जबकि सातवें ओवर में मलिंगा ने सचिन तेंदुलकर को आउट कर दिया.

एक ओर जहाँ लोग सचिन से शतक की उम्मीद लगाए बैठे थे वहीं मलिंगा ने उन्हें 18 रन के स्कोर पर ही पवेलियन लौटा दिया. सचिन के आउट होते ही स्टेडियम में बैठे उनके हज़ारों प्रशंसक मानो हतप्रभ रह गए.

लेकिन फिर गंभीर और विराट कोहली ने पारी को धैर्यपूर्वक आगे बढ़ाया. दोनों के बीच 83 रनों की साझेदारी हुई. कोहली के बाद गंभीर ने कप्तान धोनी के साथ पारी को स्थायित्व देते हुए टीम को जीत की ओर बढ़ाया और दोनों ने 91 रन जोड़े.

इसके बाद विराट कोहली दिलशान के हाथों में कैच दे बैठे. एक बार लगा कि भारतीय पारी मुसीबत में आ गई है लेकिन कप्तान धोनी ने धैर्य से खेलते हुए टीम को जीत दिलाई.

इस विश्व कप में अब तक अपने बल्ले से ज़्यादा कमाल नहीं दिखा पाए धोनी ने फ़ाइनल में एक बेहतरीन पारी खेलते हुए 91 रनों की मैच जिताऊ पारी खेली.

जयवर्धने का शतक

पहले बल्लेबाज़ी करते हुए श्रीलंका ने छह विकेट के नुक़सान पर 274 रनों का चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया और इसमें महेला जयवर्द्धने के शतक की अहम भूमिका रही.

भारत पर बैटिंग पावर प्ले भारी पड़ा और श्रीलंका ने अंतिम पाँच ओवरों में 63 रन जोड़े. शुरू के पाँच ओवरों में छह रन देने वाले ज़हीर ख़ान ने अंतिम पाँच ओवरों में 54 रन दिए और उसमें भी अंतिम दो ओवरों में 35 रन.

इस स्कोर तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाने वाली दूसरी पारी तिसारा परेरा की रही जिन्होंने नौ गेंदों में तीन चौके और एक छक्का मारकर 22 रन जोड़ दिए.

वैसे इस टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाली श्रीलंका की सलामी जोड़ी भारत के विरुद्ध कुछ ख़ास नहीं कर सकी. पहले ज़हीर ख़ान ने उपुल तरंगा को विकेट के पीछे पहली स्लिप में वीरेंदर सहवाग के हाथों कैच आउट करा दिया.
उस समय श्रीलंका का स्कोर 17 रन था और ये विकेट सातवें ओवर में गिरा. उसके बाद टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले तिलकरत्ने दिलशान हरभजन सिंह की एक गेंद पर बोल्ड हो गए. उन्होंने 33 रन बनाए थे, इस तरह टूर्नामेंट में उनका कुल स्कोर 500 रन रहा.

श्रीलंका का दूसरा विकेट 60 के स्कोर पर गिरा था जिसके बाद कप्तान संगकारा ने महेला जयवर्द्धने के साथ मिलकर 62 रन और जोड़े. उसके बाद युवराज सिंह की एक गेंद खेलने के चक्कर में संगकारा का कैच विकेट के पीछे धोनी ने लपक लिया.

संगकारा 48 रन बनाकर आउट हुए. इसके बाद जयवर्द्धने ने समरवीरा के साथ मिलकर चौथे विकेट के लिए 57 रनों की साझेदारी की और तभी युवराज की गेंद पर समरवीरा 21 रन बनाकर एलबीडब्ल्यू हो गए.

अगले खिलाड़ी चमारा कपुगडेरा अभी रुककर पिच को समझते कि अगले ही ओवर में ज़हीर ख़ान की गेंद पर उनका कैच शॉर्ट एक्स्ट्रा कवर पर सुरेश रैना ने लपक लिया.

श्रीलंका के लिए हुई कई प्रमुख साझेदारियों में जयवर्द्धने के साथ नुवान कुलसेकरा की भी पारी रही जिन्होंने 66 रन जोड़े और कुलसेकरा ने 30 गेंदों में 32 रन बनाए, जिसमें एक चौका और एक छक्का शामिल था.

टॉस की अनिश्चितता

इससे पहले टॉस को लेकर एक बार अनिश्चितता की स्थिति बन गई थी क्योंकि पहली बार जब सिक्का उछाला गया तो मैच रेफ़री सुन नहीं पाए कि कुमार संगकारा ने क्या कहा.

उसके बाद दोबारा टॉस करना पड़ा और श्रीलंकाई कप्तान कुमार संगकारा ने टॉस जीतने के बाद पहले बल्लेबाज़ी का फ़ैसला किया.

भारत ने सेमीफ़ाइनल में खेले आशीष नेहरा की जगह एस श्रीसंत को टीम में शामिल किया था. नेहरा के घायल होने के बाद आर अश्विन को शामिल किए जाने की चर्चा थी मगर ऐसा नहीं हुआ.

श्रीलंका ने एंजेलो मैथ्यूज़, अजंता मेंडिस, रंगना हेरात और चमारा सिल्वा की जगह तिसारा परेरा, सूरज रंदीव, नुवान कुलसेकरा और चमारा कपुगडेरा को शामिल किया है.

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

2007 वर्ल्डकप



ऑस्ट्रेलियाई टीम का जलवा

वर्ष 2007 का विश्व कप क्रिकेट वेस्टइंडीज़ में खेला गया. प्रतियोगिता 13 मार्च से 28 अप्रैल तक चली. कुल 51 मैच हुए और फ़ाइनल में श्रीलंका को हराकर लगातार तीसरी बार ऑस्ट्रेलिया की टीम विश्व चैम्पियन बनी. ऑस्ट्रेलिया की टीम विश्व कप में 23 मई 1999 के बाद कोई मैच नहीं हारी है. विश्व कप में लगातार मैच जीतने की संख्या 29 तक पहुँच गई है.

इस विश्व कप में 16 टीमों ने हिस्सा लिया, जिन्हें चार-चार के चार ग्रुपों में बाँटा गया. हर ग्रुप से दो-दो शीर्ष टीमें सुपर-8 में पहुँचीं और सुपर-8 की चार शीर्ष टीमें सेमी फ़ाइनल में. इस विश्व कप में 10 शीर्ष टीमों के साथ-साथ कीनिया, स्कॉटलैंड, नीदरलैंड्स, आयरलैंड, कनाडा और बरमूडा ने हिस्सा लिया.

इस विश्व कप का सबसे बड़ा उलटफेर उस समय हुआ जब ख़िताब की तगड़ी दावेदार मानी जाने वाली भारत और पाकिस्तान की टीमें पहले ही दौर में प्रतियोगिता से बाहर हो गईं. दोनों टीमें सुपर-8 में भी नहीं पहुँच पाईं. भारत की टीम अपने तीन लीग मैचों में से दो हार गई. उसे बांग्लादेश और श्रीलंका ने हरा दिया. उसने बरमूडा को हराकर विश्व कप में एकमात्र जीत दर्ज की.

कुछ ऐसा ही हाल रहा पाकिस्तान का, जब पाकिस्तान की टीम मेज़बान वेस्टइंडीज़ के साथ-साथ आयरलैंड से भी हार गए. उसे भी एकमात्र जीत ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ मिली. आयरलैंड के हाथों मिली हार के दूसरे दिन पाकिस्तानी कोच बॉब वूल्मर का निधन विश्व कप की एक दुखद घटना रही. वूल्मर अपने होटल के कमरे में मृत पाए गए थे. शुरू में उनकी मौत को हत्या बताया गया और फिर जाँच हुई. लेकिन लंबी जाँच के बाद जमैका पुलिस ने कहा कि उनकी मौत प्राकृतिक कारणों से ही हुई.

सुपर-8 की आठ टीमों में से ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ़्रीका सेमी फ़ाइनल में पहुँची. मेज़बान वेस्टइंडीज़, इंग्लैंड, बांग्लादेश और आयरलैंड की टीमें प्रतियोगिता से बाहर हो गईं. सेमी फ़ाइनल में श्रीलंका का मुक़ाबला न्यूज़ीलैंड से हुआ और ऑस्ट्रेलिया की टीम दक्षिण अफ़्रीका के सामने थी. पहले सेमी फ़ाइनल में श्रीलंका ने न्यूज़ीलैंड को 81 रनों से मात दी, तो दूसरे सेमी फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने दक्षिण अफ़्रीका को सात विकेट से हराया.

वर्ष 1996 के विश्व कप की तरह इस बार भी ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका की टीमें आमने-सामने थी. लेकिन उस बार श्रीलंका ने ऑस्ट्रेलिया को पटखनी देकर ख़िताब पर कब्ज़ा किया था. लेकिन इस बार अलग कहानी लिखी गई. बारिश के कारण मैच सिर्फ़ 38 ओवर का कर दिया गया. ऑस्ट्रेलिया के कप्तान रिकी पोंटिंग ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी चुनी. एडम गिलक्रिस्ट ने धमाकेदार पारी खेली. सिर्फ़ 104 गेंद पर उन्होंने 149 रन बनाए और ऑस्ट्रेलिया ने 38 ओवर में चार विकेट पर 281 रन बनाए.

जब तक कुमार संगकारा और सनथ जयसूर्या पिच पर थे, मैच में जान लग रही थी. लेकिन उसके बाद श्रीलंका की हार तय हो गई. बारिश के कारण फिर मैच रुका और इसे 36 ओवर का कर दिया गया और लक्ष्य 269 का दिया गया. श्रीलंका की टीम 36 ओवर में 215 रन ही बना सकती और 53 रनों से मैच हार गई।

स्पोर्ट्स खबर

2003 वर्ल्डकप



ऑस्ट्रेलिया फिर बना चैंपियन

वर्ष 2003 का विश्व कप दक्षिण अफ़्रीका में आयोजित किया गया. साथ ही ज़िम्बाब्वे और कीनिया में भी कुछ मैच खेले गए. पहली बार विश्व कप में 14 टीमों ने हिस्सा लिया. सात-सात टीमों को दो ग्रुपों में बाँटा गया. हर ग्रुप से शीर्ष तीन टीमों को सुपर सिक्स में जगह मिली और फिर चार टीमें सेमी फ़ाइनल में पहुँचीं.

एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाली 11 टीमों के अलावा आईसीसी ट्रॉफ़ी की क्वालीफ़ाइंग तीन टीमों- कनाडा, नामीबिया और नीदरलैंड्स ने भी हिस्सा लिया. ग्रुप मैचों में ग्रुप ए से ज़िम्बाब्वे और ग्रुप बी से कीनिया का सुपर सिक्स में पहुँचना सबसे बड़ी घटना थी. इंग्लैंड, पाकिस्तान, दक्षिण अफ़्रीका और वेस्टइंडीज़ की टीमें पहले दौर में ही प्रतियोगिता से बाहर हो गईं.

ग्रुप ए से भारत, ऑस्ट्रेलिया और ज़िम्बाब्वे की टीम सुपर सिक्स में पहुँची, तो ग्रुप बी से श्रीलंका, कीनिया और न्यूज़ीलैंड की टीम. भारत ने छह में से पाँच मैच जीते, तो ऑस्ट्रेलिया ने छह में से छह मैच. सुपर सिक्स में न्यूज़ीलैंड की टीम एक ही मैच जीत पाई. कीनिया की टीम भी एक ही मैच जीती लेकिन लीग मैचों के आधार पर अंक लेकर सुपर सिक्स में आने का उसे लाभ हुआ और उसने सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई. भारत और ऑस्ट्रेलिया के अलावा श्रीलंका भी सेमी फ़ाइनल में पहुँचा. भारत का मुक़ाबला कीनिया से हुआ और ऑस्ट्रेलिया की टीम श्रीलंका से भिड़ी.

सेमी फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका का मैच विश्व चैम्पियन के लिए आसान नहीं रहा. श्रीलंका के गेंदबाज़ों की शानदार गेंदबाज़ी के कारण ऑस्ट्रेलिया की टीम 212 रन ही बना पाई. एंड्रयू साइमंड्स ने शानदार 91 रन बनाए. जबकि वास ने ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को परेशान रखा. बारी जब श्रीलंका की बल्लेबाज़ी की आई, तो ऑस्ट्रेलिया के तेज़ गेंदबाज़ों ने बेहतरीन गेंदबाज़ी का प्रदर्शन किया. ब्रेट ली ने तीन शीर्ष बल्लेबाज़ों को आउट कर श्रीलंका को परेशान रखा. बारिश के कारण डकवर्थ लुईस नियम के तहत श्रीलंका की टीम 48 रन से हार गई. श्रीलंका ने 38.1 ओवर में सात विकेट पर 123 रन ही बनाए थे.

दूसरे सेमी फ़ाइनल में भारत और कीनिया का मुक़ाबला हुआ. सौरभ गांगुली और सचिन तेंदुलकर की शानदार बल्लेबाज़ी की बदौलत भारत ने 91 रनों से आसान जीत दर्ज कर दूसरी बार विश्व कप के फ़ाइनल में जगह बनाई. लेकिन 20 साल बाद विश्व कप के फ़ाइनल में पहुँची भारतीय टीम की फ़ाइनल में दुर्दशा हुई. ऑस्ट्रेलिया ने पहले खेलते हुए 359 रनों का विशाल लक्ष्य खड़ा किया. जवाब में भारत की पूरी टीम 234 रन पर आउट हो गई. रिकी पोंटिंग ने धमाकेदार 140 रन बनाए तो डेमियन मार्टिन ने 88 रन. भारत की टीम 125 रन से हारी और ऑस्ट्रेलिया ने लगातार दूसरी बार विश्व कप पर क़ब्ज़ा किया।

स्पोर्ट्स खबर

1999 वर्ल्डकप



दूसरी बार चैंपियन बना ऑस्ट्रेलिया

वर्ष 1983 के बाद एक बार फिर विश्व कप की मेजबानी इंग्लैंड को मिली. हालाँकि विश्व कप के कुछ मैच आयरलैंड, स्कॉटलैंड और नीदरलैंड्स में भी हुए. इस विश्व के स्वरूप में थोड़ा बदलाव हुआ. 12 टीमों को छह-छह के दो ग्रुपों में बाँटा गया. लेकिन अगले दौर में जाने का मौक़ा मिला सिर्फ़ छह टीमों को यानी हर ग्रुप की शीर्ष तीन टीमें.

अगला दौर कहलाया सुपर सिक्स और इस दौर में एक ग्रुप की सभी तीन टीमों को दूसरे ग्रुप की सभी तीन टीमों से मैच खेलना पड़ा. फिर अंक के आधार पर चार टीमें सेमीफ़ाइनल में पहुँचीं. ग्रुप ए से दक्षिण अफ़्रीका, भारत और ज़िम्बाब्वे की टीम सुपर सिक्स में पहुँची, तो ग्रुप बी से मौक़ा मिला- पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड को.

सुपर सिक्स में भारत पाकिस्तान से तो जीत गया लेकिन ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड ने उसे हरा दिया और भारतीय टीम सेमी फ़ाइनल में नहीं पहुँच पाई. ग्रुप स्तर के मैचों में प्रदर्शन से अलग सुपर सिक्स के लिए क्वालीफ़ाई करने वाली टीम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के आधार पर अंक आगे ले जाने के नियम का भारत को नुक़सान हुआ. जबकि पाकिस्तान को लाभ. पाकिस्तान ने भी सुपर सिक्स में एक ही मैच जीता लेकिन चूँकि क्वालीफ़ाई करने वाली टीमों को उसने ग्रुप मैचों में हराया था इसलिए सुपरसिक्स में वे अंक उसके खाते में जुड़ गए.

पाकिस्तान के अलावा न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका ने सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई. सईद अनवर के शानदार शतक की बदौलत पाकिस्तान ने न्यूज़ीलैंड को हराकर फ़ाइनल में जगह बनाई. ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका के बीच दूसरा सेमी फ़ाइनल अति रोमांचक रहा. साँस रोक देने वाले इस मैच में नतीजा तो टाई रहा. लेकिन सुपर सिक्स में रन गति के आधार पर दक्षिण अफ़्रीका से आगे रहने के कारण ऑस्ट्रेलिया को फ़ाइनल में जगह मिली.

लॉर्ड्स में हुआ फ़ाइनल मैच एकतरफ़ा रहा और ऑस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान को आठ विकेट से हराकर विश्व कप का ख़िताब अपने नाम किया।


स्पोर्ट्स खबर

1996 वर्ल्डकप


वर्ष 1996 में एक बार फिर विश्व कप का आयोजन भारतीय उपमहाद्वीप को मिला और इस बार भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका ने इसकी संयुक्त मेजबानी की. इस विश्व कप में 12 देशों ने हिस्सा लिया. संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड्स और कीनिया ने पहली बार विश्व कप में भाग लिया. नीदरलैंड्स ने अपने पाँचों मैच गँवाए और संयुक्त अरब अमीरात ने एक मैच में जीत हासिल की लेकिन कीनिया ने वेस्टइंडीज़ को हराकर सबको चौंकाया.

सभी 12 टीमों को छह-छह के दो ग्रुपों में बाँटा गया. दोनों ग्रुपों की शीर्ष चार टीमों को क्वार्टर फ़ाइनल में जगह मिली. वैसे तो 15 ओवर तक दो फ़ील्डरों के ही 30 गज के दायरे से बाहर रहने का नियम तो 1992 के विश्व कप से ही आया था लेकिन बल्लेबाज़ों ने इसका असली फ़ायदा वर्ष 1996 के विश्व कप से उठाना शुरू किया. सबसे ज़्यादा इसका लाभ उठाया तीन टीमों- श्रीलंका, भारत और ऑस्ट्रेलिया ने. इसी विश्व कप से तीसरे अंपायर की भी भूमिका शुरू हुई.

इस विश्व कप में श्रीलंका में होने वाले मैचों को लेकर विवाद भी हुआ. विश्व कप के कुछ दिन पहले संदिग्ध तमिल विद्रोहियों के हमले में 90 लोग मारे गए थे. ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ ने श्रीलंका में जाकर मैच खेलने से इनकार कर दिया. लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने ये दोनों मैच का विजेता श्रीलंका को घोषित कर दिया. श्रीलंका को इसका लाभ मिला और ग्रुप में उसकी टीम शीर्ष स्थान पर रही. ग्रुप बी में दक्षिण अफ़्रीका ने अपने सभी मैच जीते और उसे तगड़ा दावेदार भी माना जा रहा था.

ग्रुप ए से अन्य टीमें जो क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँचीं, वे थीं- ऑस्ट्रेलिया, भारत और वेस्टइंडीज़ की टीमें. ऑस्ट्रेलिया ने भी पाँच में से तीन मैच जीते और भारत ने भी तीन. ग्रुप बी से क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई दक्षिण अफ़्रीका, पाकिस्तान, न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड ने. क्वार्टर फ़ाइनल में इंग्लैंड का मुक़ाबला श्रीलंका से हुआ, तो भारत का मुक़ाबला अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान से. दक्षिण अफ़्रीका की टीम भिड़ी वेस्टइंडीज़ से तो ऑस्ट्रेलिया के सामने थी वेस्टइंडीज़ की टीम.

पहले सेमीफ़ाइनल में जयसूर्या की शानदार पारी रंग लाई और इंग्लैंड का विश्व कप से पत्ता साफ़ हो गया. भारत के ख़िलाफ़ मैच में पाकिस्तान के कप्तान वसीम अकरम ही नहीं खेल पाए. भारत के 287 रनों के जवाब में पाकिस्तान ने शुरुआत तो अच्छी की लेकिन एक बार खिलाड़ी आउट होना शुरू हुए तो फिर ताँता ही लग गया. पाकिस्तान की टीम 39 रनों से हार गई. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मैच में न्यूज़ीलैंड ने क्रिस हैरिस के 130 रनों की बदौलत 286 का बड़ा स्कोर खड़ा किया. लेकिन मार्क वॉ ने विश्व कप में अपनी तीसरा सैकड़ा जड़ा और अपनी टीम को सेमी फ़ाइनल में पहुँचा दिया.दूसरी ओर कीनिया के हाथों मिली हार से शर्मसार वेस्टइंडीज़ ने शानदार वापसी की और दक्षिण अफ़्रीका को 19 रनों से हराकर आख़िरी चार में जगह बनाई. लारा ने 111 रन बनाए.

कोलकाता के ईडन गार्डन में भारत और श्रीलंका के बीच हुआ सेमी फ़ाइनल मैच काफ़ी नाटकीय रहा. एक लाख 10 हज़ार से ज़्यादा संख्या में मौजूद दर्शक भारत की तय मानी जा रही हार पचा नहीं पाए और हुडदंग पर उतर आए. श्रीलंका के 252 रनों के जवाब में भारत ने 120 रन पर अपने आठ विकेट गँवा दिए थे. पिच तो ऐसी हो गई कि गेंद कब कहाँ घूम रही थी, बल्लेबाज़ों के पल्ले कुछ भी नहीं पड़ रहा था. हुड़दंग के कारण आईसीसी ने श्रीलंका को विजेता घोषित कर दिया. हालाँकि उनकी जीत तो तय ही थी.

ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ का मैच भी क्रिकेट में उतार-चढ़ावा की एक रोमांचक दास्तां बना. पहले खेलते हुए एक समय ऑस्ट्रेलिया ने सिर्फ़ 15 रन पर चार विकेट गँवा दिए थे. लेकिन स्टुअर्ट लॉ और माइकल बेवन ने पारी संभाली और ऑस्ट्रेलिया 207 रन बनाने में कामयाब रहा. एक समय वेस्टइंडीज़ की जीत पक्की लग रही थी और 42वें ओवर में उसका स्कोर था दो विकेट पर 165 रन. लेकिन शेन वॉर्न ने चार विकेट लिए, कप्तान मार्क टेलर ने अच्छी रणनीति अपनाई और वेस्टइंडीज़ ने 37 रन पर अपने आठ विकेट गँवा दिए. कप्तान रिची रिचर्ड्सन 49 रन पर नाबाद रहे और खड़े देखते रहे. ऑस्ट्रेलिया की टीम पाँच रन से जीत गई.

फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया का मुक़ाबला श्रीलंका से हुआ. लेकिन इतने एकतरफ़ा फ़ाइनल की किसी ने कल्पना नहीं की थी. ऑस्ट्रेलिया ने पहले खेलते हुए मार्क टेलर के 74 रनों की मदद से 241 रन बनाए लेकिन श्रीलंका ने तीन विकेट के नुक़सान पर ही लक्ष्य हासिल कर लिया. किसी भी विश्व कप फ़ाइनल में एक खिलाड़ी ने इतना दमख़म नहीं दिखाया था, जैसा कि इस फ़ाइनल में अरविंद डी सिल्वा ने दिखाया. उन्होंने दो कैच पकड़े, तीन विकेट लिए और नाबाद 107 रनों की पारी खेली. श्रीलंका ने लाहौर के मैदान पर जीत हासिल की और पहली बार विश्व कप का ख़िताब हासिल किया. भारत और पाकिस्तान के बाद श्रीलंका ख़िताब जीतने वाला तीसरा एशियाई देश बना।
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1992 वर्ल्डकप



पाकिस्तान ने रचा इतिहास

वर्ष 1992 में हुए विश्व कप की मेजबानी का मौक़ा मिला ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड को. इस विश्व कप में कई बदलाव किए गए. पहली बार दिन-रात के मैच हुए. मैच में खिलाड़ी रंगीन कपड़े पहनकर उतरे और उजले गेंदों का भी इस्तेमाल हुआ. अब पहले 15 ओवर के दौरान 30 गज के दायरे से बाहर सिर्फ़ दो खिलाड़ी ही रह सकते थे. इस नए नियम के कारण पिंच हिटर खिलाड़ी का जन्म हुआ और इस विश्व कप में इयन बॉथम ने यह तमग़ा हासिल किया. इसी विश्व कप में न्यूज़ीलैंड ने स्पिनर से गेंदबाज़ी की शुरुआत करके एक और नया प्रयोग किया.

रंगभेद की नीति के कारण लगी पाबंदी हटने के बाद पहली बार दक्षिण अफ़्रीका की टीम ने इस विश्व कप में हिस्सा लिया. नौ टीमों ने इस विश्व कप में हिस्सा लिया. टीमों को किसी ग्रुप में नहीं बाँटा गया. राउंड-रॉबिन के आधार पर 36 मैच खेले गए और चार शीर्ष टीमों को सेमी फ़ाइनल में प्रवेश मिला.

मौजूदा चैम्पियन और मेजबान ऑस्ट्रेलिया पर दबाव कुछ ज़्यादा ही था और उसे इसका नुक़सान ही हुआ. ऑस्ट्रेलिया की टीम अपना पहला मैच ही हार गई. ऑस्ट्रेलिया को दक्षिण अफ़्रीका ने भी हराया और इंग्लैंड ने भी. पाकिस्तान ने विश्व कप में अपनी शुरुआत काफ़ी ख़राब की. वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ पहला मैच वे 10 विकेट से हार गए. लेकिन उनके भाग्य ने पलटा खाया इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मैच में. इंग्लैंड ने उन्हें सिर्फ़ 74 रन पर आउट कर दिया. लेकिन बारिश के कारण मैच रद्द हो गया और पाकिस्तान को एक अंक भी मिल गया जो बाद में उसके लिए काफ़ी अहम साबित हुआ. इसी एक अंक के अंतर के कारण ऑस्ट्रेलिया की टीम सेमी फ़ाइनल में नहीं पहुँच पाई और पाकिस्तान को मौक़ा मिला सेमी फ़ाइनल में जगह बनाने का.

न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड की टीमों ने भी राउंड रॉबिन मुक़ाबले में अच्छा प्रदर्शन किया. न्यूज़ीलैंड ने आठ में से सात मैच जीते, तो इंग्लैंड ने आठ में से पाँच. पहली बार विश्व कप में खेल रही दक्षिण अफ़्रीका की टीम ने भी अच्छा प्रदर्शन किया और इंग्लैंड के बाद तीसरे नंबर पर रही और उसे सेमी फ़ाइनल में जगह मिली. भारत की टीम सिर्फ़ दो मैच ही जीत पाई. हाँ, उसने पाकिस्तान को हराने में ज़रूर सफलता पाई. इसके अलावा उसे ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ ही जीत मिल पाई.

सेमी फ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड का मुक़ाबला पाकिस्तान से हुआ तो दक्षिण अफ़्रीका की टीम इंग्लैंड से भिड़ी. पहले सेमी फ़ाइनल में पाकिस्तान को जीत के लिए 263 रनों का लक्ष्य मिला जिसे उन्होंने पूरा कर लिया और पहली बार फ़ाइनल में जगह बनाई. इंज़माम ने 60 रन बनाए तो मियाँदाद ने 57 रन. दूसरे सेमी फ़ाइनल में बारिश के कारण दक्षिण अफ़्रीका की जीतने की उम्मीदों पर पानी फिर गया. बारिश के कारण लक्ष्य फिर से निर्धारित करने के नए नियम की गाज दक्षिण अफ़्रीका पर गिरी. एक समय दक्षिण अफ़्रीका को जीत के लिए 13 गेंद पर 22 रन चाहिए थे. लेकिन बारिश क्या आई, लक्ष्य फिर से निर्धारित हुआ और फिर दक्षिण अफ़्रीका को एक गेंद पर 21 रन बनाने का लक्ष्य दिया गया. और इस तरह 20 रन से हारकर दक्षिण अफ़्रीका की उसके पहले विश्व कप से दुर्भाग्यपूर्ण विदाई हुई.

फ़ाइनल में पाकिस्तान के सामने थी इंग्लैंड की टीम. पाकिस्तान की टीम आक्रमक मूड में थी. डेरेक प्रिंगल ने 22 रन पर तीन विकेट लिए और पाकिस्तान के सलामी बल्लेबाज़ों को चलता कर दिया. लेकिन उसके बाद इमरान ख़ान (72) और जावेद मियाँदाद (58) ने पाकिस्तानी पारी संभाली. इंज़माम ने भी 42 रन बनाए और वसीम अकरम ने फटाफट 33 रन. पाकिस्तान ने 50 ओवर में छह विकेट पर 249 रन बनाए. जवाब में इंग्लैंड की शुरुआत की ख़राब रही और उसके चार विकेट सिर्फ़ 69 रन पर गिर गए. लेकिन नील फ़ेयरब्रदर और एलेन लैम्ब ने पारी संभाली. लेकिन लैंब और क्रिस लुईस को लगातार गेंदों पर चलता कर अकरम ने पाकिस्तान की जीत पक्की कर दी. पाकिस्तान ने 22 रन से जीत हासिल की और पहली बार विश्व कप का ख़िताब जीता।

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1987 वर्ल्डकप



पहली बार चैंपियन बने कंगारू

लगातार तीन विश्व कप की मेजबानी के बाद वर्ष 1987 के विश्व कप की मेजबानी भारत और पाकिस्तान को संयुक्त रूप से मिली. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि 1983 के विश्व कप में जीत हासिल करने के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का दावा मज़बूत हुआ. भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता उठान पर थी. मैच का स्वरूप तो वही रहा लेकिन ओवर घटाकर 50 ओवर कर दिए गए. इसी विश्व कप से मैचों में निष्पक्ष अंपायरिंग के लिए दो देशों के मैच में तीसरे देश के अंपायर रखे जाने लगे.

ग्रुप ए में भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और ज़िम्बाब्वे की टीमें थी, तो ग्रुप बी में पाकिस्तान, इंग्लैंड, वेस्टइंडीज़ और श्रीलंका की टीमें थी. भारत की टीम ने ग्रुप मुक़ाबले में शानदार प्रदर्शन किया. ऑस्ट्रेलिया से उसका मुक़ाबला ज़बरदस्त रहा. दोनों ने एक-एक बार एक-दूसरे को हराया. लेकिन रन गति के आधार पर भारत को अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान मिला. न्यूज़ीलैंड की टीम सिर्फ़ दो मैच जीत पाई जबकि ज़िम्बाब्वे के हिस्से में कोई जीत नहीं आई.

ग्रुप बी से पाकिस्तान की टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और शीर्ष स्थान हासिल किया. इंग्लैंड की टीम ने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया लेकिन दूसरे नंबर पर आ ही गई. पहली बार वेस्टइंडीज़ की टीम सेमी फ़ाइनल में भी नहीं पहुँच पाई. हालाँकि उन्होंने श्रीलंका को 191 रनों के बड़े अंतर से हराया.

पहले सेमी फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया का मुक़ाबला पाकिस्तान से हुआ. लाहौर में हुआ यह मैच काफ़ी रोमांचक रहा. ऑस्ट्रेलिया ने पहले खेलते हुए आठ विकेट पर 267 रन बनाए. हालाँकि इमरान ख़ान ने तीन विकेट चटकाए. लेकिन डेविड बून ने 65 और वेलेटा ने 48 रन बनाए. स्टीव वॉ ने आख़िरी ओवर में 18 रन बनाए. जवाब में पाकिस्तान ने 38 रन पर ही तीन विकेट गिर गए. इमरान ख़ान और जावेद मियाँदाद ने पारी संभालने की कोशिश की लेकिन उनके आउट होते ही पाकिस्तान की पारी लड़ख़ड़ा गई. मियाँदाद ने 70 और इमरान ने मैकडरमॉट ने पाँच विकेट लिए और ऑस्ट्रेलिया ने दूसरी बार फ़ाइनल में जगह बनाई.

दूसरे सेमी फ़ाइनल में मेजबान भारत का मुक़ाबला था इंग्लैंड से. मुंबई की पिच पर ग्राहम गूच और माइक गैटिंग ने स्वीप शॉट खेल-खेलकर भारतीय गेंदबाज़ों के छक्के छुड़ा दिए और 19 ओवर में 117 रन बना डाले. गूच ने 115 रनों की पारी खेली और गैटिंग ने 56 रन बनाए. इंग्लैंड ने 50 ओवर में छह विकेट पर 254 रन बनाए. भारत के लिए यह स्कोर भारी पड़ा और पूरी टीम 219 रन बनाकर आउट हो गई. अज़हरुद्दीन ने 64 रन बनाए, श्रीकांत ने 31 और कपिल देव ने 30. भारत की टीम 35 रनों से हारकर विश्व कप से बाहर हो गई.

फ़ाइनल में इंग्लैंड का मुक़ाबला हुआ ऑस्ट्रेलिया से. जानकारों के मुताबिक़ यह विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया के दबदबे की शुरुआत थी. ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी का फ़ैसला किया. डेविड बून और ज्योफ़ मार्श ने पारी की शुरुआत की और अच्छे रन बटोरे. डेविड बून ने सर्वाधिक 75 रन बनाए. वेलेटा 45 रन पर नाबाद रहे जबकि डीन जोंस ने 33 रन बनाए. ऑस्ट्रेलिया ने 50 ओवर में पाँच विकेट पर 253 रन बनाए. जब तक माइक गैटिंग पिच पर थे, ये लग रहा था कि इंग्लैंड जीत सकता है. लेकिन उनके और एलेन लैंब के आउट होते ही इंग्लैंड की पारी लड़खड़ा गई. एक बार फिर वे दुर्भाग्यशाली रहे और विश्व कप का ख़िताब उनसे दूर रह गया. ऑस्ट्रेलिया ने सात रन से जीत हासिल कर विश्व कप पर पहली बार क़ब्ज़ा जमाया।

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वर्ल्डकप 1983



भारत ने रचा इतिहास

लगातार तीसरे वर्ष इंग्लैंड ने ही विश्व कप की मेजबानी की. 1983 का विश्व कप भारतीय टीम के लिए बहुत अहम साबित हुआ. कमज़ोर समझी जाने वाली भारतीय टीम ने दिग्गजों को धूल चटाई और पहली बार विश्व कप पर क़ब्ज़ा किया. दो दूसरी ओर लगातार तीन बार विश्व कप का ख़िताब जीतने का वेस्टइंडीज़ का सपना चकनाचूर हो गया.

इस विश्व कप का स्वरूप कमोबेश पहले जैसा ही था. यानी आठ टीमों ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. चार-चार के दो ग्रुपों में टीमों को बाँटा गया और दो शीर्ष टीमों को सेमी फ़ाइनल में जगह मिली. अंतर सिर्फ़ ये हुआ कि अब ग्रुप की टीमों को आपस में एक-एक नहीं दो-दो मैच खेलने थे. वाइड और बाउंसर गेंदों के लिए भी नियम कड़े किए गए और 30 गज के दायरे में चार खिलाड़ियों को रहना ज़रूरी कर दिया गया.

ग्रुप ए में इंग्लैंड, पाकिस्तान, न्यूज़ीलैंड और श्रीलंका की टीमें थी, तो ग्रुप बी में वेस्टइंडीज़, भारत, ऑस्ट्रेलिया और ज़िम्बाब्वे की टीमें. ग्रुप ए में इंग्लैंड की टीम ने अपना दम दिखाया. उसने पाकिस्तान और श्रीलंका की टीमों को दो-दो बार हराया. हालाँकि पाकिस्तान और न्यूज़ीलैंड की टीमों ने तीन-तीन मैच जीते लेकिन रन गति के आधार पर सेमी फ़ाइनल में जगह मिली पाकिस्तान को.

ग्रुप बी में भारत ने इस विश्व कप की शानदार शुरुआत की. उसने अपने पहले ही मैच में विश्व चैम्पियन वेस्टइंडीज़ की टीम को 34 रनों से हराया. भारत ने ऑस्ट्रेलिया और ज़िम्बाब्वे को भी मात दी. भारत ने छह में से चार मैच जीते और वेस्टइंडीज़ के साथ सेमी फ़ाइनल में पहुँचने का गौरव हासिल किया. ग्रुप मैचों में वेस्टइंडीज़ के विंस्टन डेविस ने बेहतरीन गेंदबाज़ी का प्रदर्शन किया. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मैच में 51 रन देकर सात विकेट चटकाए.

पहले सेमी फ़ाइनल में मेजबान इंग्लैंड का मुक़ाबला भारत से हुआ. कपिल देव, रोजर बिन्नी और मोहिंदर अमरनाथ की शानदा गेंदबाज़ी के कारण भारत ने इंग्लैंड को 213 रनों पर ही समेट दिया. जब बल्लेबाज़ी की बारी आई, तो अमरनाथ, यशपाल शर्मा और संदीप पाटिल ने शानदार बल्लेबाज़ी कर भारत को 55वें ओवर में ही चार विकेट के नुक़सान पर जीत दिला दी.

दूसरे सेमी फ़ाइनल में पाकिस्तान को वेस्टइंडीज़ ने बुरी तरह हराया. पहले बल्लेबाज़ी करते हुए पाकिस्तान की टीम ने 60 ओवर में आठ विकेट पर 184 रन बनाए. सलामी बल्लेबाज़ मोहसिन ख़ान ने गावसकर के बाद धीमी बल्लेबाज़ी का एक और नमूना पेश किया. उन्होंने 176 गेंद पर एक चौके की मदद से सिर्फ़ 70 रन बनाए. जवाब में वेस्टइंडीज़ ने दो विकेट पर ही लक्ष्य हासिल कर लिया. रिचर्ड्स 80 और गोम्स 50 रन पर नाबाद रहे.

फ़ाइनल में वेस्टइंडीज़ का मुक़ाबला था भारत से. एक ओर थी दो बार ख़िताब जीतने वाली वेस्टइंडीज़ की टीम तो दूसरी ओर थी पहले के विश्व कप मैचों में ख़राब प्रदर्शन करने वाली भारतीय टीम. वेस्टइंडीज़ ने भारत को सिर्फ़ 183 रनों पर समेट कर शानदार शुरुआत की और जवाब में एक विकेट पर 50 रन भी बना लिए. वेस्टइंडीज़ समर्थक जीत का जश्न मनाने की तैयारी करने लगे. लेकिन मोहिंदर अरमनाथ और मदन लाल ने शानदार गेंदबाज़ी की और मैच का पासा ही पलट दिया. हेंस और रिचर्ड्स का अहम विकेट मदन लाल को मिला तो बिन्नी की गेंद पर क्लाइव लॉयड को बेहतरीन कैच लपका कपिल देव ने. बाद में दुजों (25) और मार्शल (18) ने पारी संभालने की कोशिश की लेकिन उनके आउट होते ही मैच उनकी झोली से निकल गया. दोनों को मोहिंदर अमरनाथ ने आउट किया. अमरनाथ ने होल्डिंग को एलबीडब्लू आउट कर भारत को शानदार जीत दिलाई. वेस्टइंडीज़ की पूरी टीम 140 रन बनाकर आउट हो गई और भारत पहली बार विश्व कप का विजेता बना ।

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1979 वर्ल्डकप


चार साल बाद वर्ष 1979 में एक बार फिर विश्व कप क्रिकेट का आयोजन हुआ और मेजबानी की इंग्लैंड ने ही. इस विश्व कप का स्वरूप 1975 विश्व कप की तरह ही रहा. आठ टीमों ने इस विश्व कप में हिस्सा लिया. चार-चार टीमों के दो ग्रुप बने और दो शीर्ष टीमों को सीधे सेमी फ़ाइनल में प्रवेश मिला. मैच 60 ओवर का ही रहा और खिलाड़ी उजले कपड़े पहनकर ही मैदान में उतरे.

इस बार ग्रुप ए में इंग्लैंड, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की टीमें थी, तो ग्रुप बी में वेस्टइंडीज़, न्यूज़ीलैंड, श्रीलंका और भारत. श्रीलंका की टीम आईसीसी ट्रॉफ़ी जीतने के कारण विश्व कप में खेलने आई थी. इस विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया ने एक अनजान सी टीम चुनी, क्योंकि उसके अच्छे खिलाड़ी कैरी पैकर के साथ जुड़े हुए थे. हालाँकि वेस्टइंडीज़ और पाकिस्तान ने कैरी पैकर की वर्ल्ड सिरीज़ से जुड़े खिलाड़ियों को भी टीम में रखा.

ख़िताब की तगड़ी दावेदार वेस्टइंडीज़ की टीम दो मैच जीतकर अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान पर रही. श्रीलंका के ख़िलाफ़ उसका मैच बारिश की भेंट चढ़ गया. श्रीलंका ने भारत को हराकर प्रतियोगिता का सबसे बड़ा उलटफेर किया. इस मैच में श्रीलंका ने भारत को 47 रन से हराया. इस ग्रुप से न्यूज़ीलैंड की टीम दूसरे नंबर पर रही. भारतीय टीम इस विश्व कप में एक भी मैच नहीं जीत पाई.

ग्रुप ए से इंग्लैंड की टीम ने सभी मैच जीतकर शीर्ष स्थान हासिल किया, तो पाकिस्तान ने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया को हराकर सेमीफ़ाइनल में जगह बनाई. ग्रुप स्टेज़ पर इंग्लैंड ने कनाडा को सिर्फ़ 45 रन पर आउट किया लेकिन दोनों ग्रुपों में शतक सिर्फ़ एक ही लगा. वेस्टइंडीज़ के गॉर्डन ग्रीनिज़ ने भारत के ख़िलाफ़ 106 रनों की पारी खेली.

पहले सेमी फ़ाइनल में इंग्लैंड की भिड़ंत न्यूज़ीलैंड से हुई. माइक ब्रियरली और ग्राहम गूच की शानदार पारी की बदौलत इंग्लैंड ने आठ विकेट पर 221 रन बनाए. डेरेक रेंडल ने भी 42 रनों की अहम पारी खेली. न्यूज़ीलैंड ने भी अच्छी शुरुआत की और जॉन राइट ने 69 रन ठोंके. लेकिन अच्छे ऑल-राउंडर के होते भी टीम इंग्लैंड से नौ रन पीछे रह गई.

दूसरे सेमी फ़ाइनल में पहले खेलते हुए वेस्टइंडीज़ ने छह विकेट पर 293 रन बनाए. ग्रीनिज़ ने 73 और डेसमंड हेंस ने 65 रन बनाए. विवियन रिचर्ड्स ने भी 42 रनों का योगदान दिया. लेकिन ज़हीर अब्बास और माजिद ख़ान ने वेस्टइंडीज़ को पसीने-पसीने कर दिया. दोनों ने दूसरे विकेट के लिए 166 रनों की साझेदारी की. लेकिन उनके आउट होते ही पाकिस्तान की पारी लड़खड़ाई और वेस्टइंडीज़ 43 रनों से जीत गया. माजिद ख़ान ने 81 और ज़हीर अब्बास ने 93 रन बनाए.

23 जून को लॉर्ड्स के मैदान पर लगातार दूसरी बार फ़ाइनल खेलने पहुँची वेस्टइंडीज़ की टीम तो इस बार मेजबान इंग्लैंड को भी किस्मत आज़माने का मौक़ा मिला. विवियन रिचर्ड्स ने शानदार शतक ठोंका और कॉलिस किंग ने भी बेहतरीन पारी खेली. वेस्टइंडीज़ ने 286 रनों का स्कोर खड़ा किया. रिचर्ड्स 138 रन पर नाबाद रहे जबकि किंग ने 86 रन बनाए. इंग्लैंड ने अच्छी शुरुआत की और पहले विकेट के लिए 129 रन जोड़े. लेकिन रन काफ़ी धीमी गति से बने. ब्रियरली ने 64 रन बनाए लेकिन 130 गेंद पर जबकि बॉयकॉट ने 105 गेंद पर 57 रन. इन दोनों के आउट होते ही इंग्लैंड की टीम धराशायी हो गई. सिर्फ़ गूच ने 32 रन बनाए. इंग्लैंड की टीम 51 ओवर में 194 रन बनाकर आउट हो गई. वेस्टइंडीज़ ने लगातार दूसरी बार विश्व कप पर क़ब्ज़ा किया।
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1975 वर्ल्डकप



वर्ष 1975 में पहला विश्व कप क्रिकेट इंग्लैंड में खेला गया था. सात जून से 21 जुलाई तक खेली गई इस प्रतियोगिता में आठ टीमों ने हिस्सा लिया था. आठ टीमों को चार-चार के दो ग्रुपों में रखा गया था. हर ग्रुप की शीर्ष दो टीमों को सीधे सेमी फ़ाइनल में प्रवेश दिया गया था.

उस समय 60 ओवर का एक मैच होता था. उस समय खिलाड़ी क्रिकेट की पारंपरिक पोशाक यानी उजले कपड़े पहनते थे. सभी मैच दिन में ही होते थे. मैच कुल 120 ओवर का होता था. इसलिए मैच जल्दी ही शुरू हो जाते थे.

पहले ग्रुप में इंग्लैंड, न्यूज़ीलैंड, भारत और ईस्ट अफ़्रीका की टीमें थीं, तो दूसरे ग्रुप में थे- वेस्टइंडीज़, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और श्रीलंका. इसी विश्व कप के एक मैच में भारत के महान सुनील गावसकर ने पूरे 60 ओवर बल्लेबाज़ी की और सिर्फ़ 36 रन बनाए. अपनी पारी में उन्होंने सिर्फ़ एक चौका लगाया था. मैच था इंग्लैंड के ख़िलाफ़. इंग्लैंड ने लॉर्ड्स के मैदान पर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 60 ओवर में चार विकेट पर 334 रन बनाए थे. डेनिस एमिस ने 137 रनों की पारी खेली थी.

लेकिन जवाब में भारत ने 60 ओवर में तीन विकेट पर 132 रन बनाए. गावसकर ने 174 गेंद का सामना किया और एक चौके की मदद से सिर्फ़ 36 रन बनाए और नाबाद रहे. उसी मैच में सिर्फ़ 59 गेंद का सामना करते हुए गुंडप्पा विश्वनाथ ने सर्वाधिक 37 रन बनाए थे. कहा जाता है कि वनडे क्रिकेट का विरोध करने के लिए गावसकर ने ऐसी धीमी पारी खेली थी. इस विश्व कप में भारत के कप्तान थे श्रीनिवास वेंकटराघवन.

हालाँकि ईस्ट अफ़्रीका के ख़िलाफ़ मैच में भारत ने 10 विकेट से जीत हासिल की. और इस मैच में सुनील गावसकर ने 86 गेंद पर नाबाद 65 रनों की पारी खेली और पारी में नौ चौके भी लगाए. भारत इस विश्व कप में सिर्फ़ एक मैच जीत पाया, वो भी ईस्ट अफ़्रीका के ख़िलाफ़.

पहले ग्रुप से इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड की टीमें सेमी फ़ाइनल में पहुँचीं, तो दूसरे ग्रुप से मौक़ा मिला वेस्टइंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया को. पहला सेमी फ़ाइनल इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ. जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने चार विकेट से जीत दर्ज की. कम स्कोर वाले इस मैच में पहले खेलते हुए इंग्लैंड की टीम सिर्फ़ 93 रन बनाकर आउट हो गई. जबाव में ऑस्ट्रेलिया ने लक्ष्य हासिल करने के लिए छह विकेट गँवा दिए.

दूसरे सेमीफ़ाइनल में वेस्टइंडीज़ की टीम का मुक़ाबला था न्यूज़ीलैंड से. वेस्टइंडीज़ की टीम को विश्व कप का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा था और उसने निराश भी नहीं किया. वेस्टइंडीज़ ने पाँच विकेट से जीत हासिल की. पहले खेलते हुए न्यूज़ीलैंड ने 158 रन बनाए. वेस्टइंडीज़ ने पाँच विकेट गँवाकर की लक्ष्य हासिल कर लिया. कालीचरण ने 72 और ग्रीनिज़ ने 55 रनों की शानदार पारी खेली.

फ़ाइनल में लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर वेस्टइंडीज़ का मुक़ाबला हुआ ऑस्ट्रेलिया से. मैच काफ़ी रोमांचक था और इस ऐतिहासिक मैच में पहला विश्व कप जीतने का गौरव हासिल किया वेस्टइंडीज़ ने. कप्तान क्लाइव लॉयड की अगुआई में टीम ने अच्छा प्रदर्शन किया और 17 रनों से जीत हासिल की. वेस्टइंडीज़ ने क्लाइव लॉयड के शानदार शतक (102) और रोहन कन्हाई के 55 रनों की मदद से 60 ओवर में आठ विकेट पर 291 रन बनाए. ऑस्ट्रेलिया ने अच्छी चुनौती दी. लेकिन उनकी टीम 58.4 ओवर में 274 रन बनाकर आउट हो गई. ऑस्ट्रेलिया के पाँच बल्लेबाज़ रन आउट हुए.

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क्रिकेट विश्व कप वनडे क्रिकेट की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगिता है. हर चार साल पर होने वाली ये प्रतियोगिता वर्ष 1975 में इंग्लैंड से शुरू हुई थी. पहले यह प्रतियोगिता 60 ओवरों की होती थी. पहले खिलाड़ी उजली पोशाक में होते थे, तो समय के साथ हर चीज़ रंगीन होता गया.

खिलाड़ियों ने रंगीन पोशाकें पहननी शुरू की, गेंद उजली हो गई और अंपायर तक रंगीन पोशाक में नज़र आने लगे. मैच दिन-रात के होने लगे और 50-50 ओवरों के मैच होने लगे.

पहले तीन विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित हुए और तीन में दो विश्व कप का ख़िताब वेस्टइंडीज़ ने जीता. लेकिन 1983 का विश्व कप जीतकर भारत ने बड़ा उलटफेर किया.

1983 विश्व कप के फ़ाइनल में वेस्टइंडीज़ की टीम क्या हारी, विश्व क्रिकेट में उसका वर्चस्व ही कम होने लगा. लेकिन उसके बाद शुरू हुआ ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के वर्चस्व की कहानी.

भारतीय टीम 1983 के बाद वर्ष 2003 में विश्व कप के फ़ाइनल में पहुँची, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने उसे रौंद दिया. ऑस्ट्रेलिया ने सबसे ज़्यादा चार बार विश्व कप का ख़िताब जीता है और तीन बार लगातार ख़िताब जीतकर नया रिकॉर्ड बनाया है.

भारत के लिहाज़ से देखें तो 1983 में ख़िताब जीतने के बाद उसके लिए सबसे अच्छा विश्व कप रहा वर्ष 2003 का. ठीक 20 साल बाद भारतीय टीम विश्व कप के फ़ाइनल में पहुँची.

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने ज़बरदस्त बल्लेबाज़ी की और फ़ाइनल छोड़कर क़रीब-क़रीब हर मैच में उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया. लेकिन ऐन मौक़े पर सचिन नहीं चले और न चली भारतीय टीम।
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बुधवार, 19 जनवरी 2011

लारा नहीं बाबा ऑक्टोपस पॉल कहो


लारा करेंगे भविष्यवाणी

क्रिकेट के महाकुंभ से पहले हुई है सबसे बड़ी भविष्यवाणी । वेस्टइंडीज के ब्रायन लारा ने किया है ऐलान कि टीम इंडिया ही रचेगी साल 2011 में इतिहास ।
ये बातें हकीकत में कितनी बदलती है ये तो वक्त बताएगा लेकिन आईपीएल में नहीं बिके लारा अब नई भूमिका में दिखने वाले हैं.। जी हां लारा अब बाबा ऑक्टोपस पॉल की भूमिका में फीवर 2011 यानि क्रिकेट के सबसे बड़े महाकुंभ वर्ल्ड कप में अपनी भविष्यवाणी से सबका ध्यान अपनी ओर खीचेंगे।पूर्व कैरेबियाई कप्तान और कभी वर्ल्ड क्रिकेट पर राज करने वाले...वेस्टइंडीज़ के पूर्व बल्लेबाज़ ब्रायन चार्ल्स लारा ने...बिना किसी हिचक के साफ ऐलान कर दिया है...कि वर्ल्ड कप 2011 में अगर किसी टीम की तूती बोलेगी....तो वो सिर्फ और सिर्फ टीम इंडिया ही होगी लारा इस बात से भली भांति वाकिफ हैं...कि एशियन सबकॉन्टिनेंट...खासकर भारतीय पिचों पर टीम इंडिया के खिलाफ मोर्चा खोलना...विरोधी टीमों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा... फिर चाहे डिफेंडिंग चैम्पियन ऑस्ट्रेलिया...इनफॉर्म इंग्लैंड...साउथ अफ्रीका या फिर खुद कैरेबियाई टीम वेस्टइंडीज़ ही क्यों ना हो..
लारा वर्ल्ड कप से पहले टीम इंडिया की जीत का दावा कर रहे हैं...तो इसके पीछे वो सिर्फ टीम इंडिया के दमदार खेल को ही वजह नहीं बता रहे.। लारा के मुताबिक...वर्ल्ड कप 2011 का खिताब भारत की झोली में आएगा..और इस कारनामे को अंजाम देगा..क्रिकेट का भगवान...सचिन रमेश तेंदुलकर...जो खुद लारा के भी भगवान हैं.।लारा ने क्रिकेट के सबसे बड़े महाकुंभ से पहले...भारत के जीत की भविष्यवाणी कर...टीम इंडिया को तो खुश किया ही है....साथ ही उन्होंने क्रिकेट क्रेज़ी इस देश के करोड़ों फैंस को भी अपना दीवाना बना लिया है।

 
 
 
 

धोनी का Survival Plan


करनी होगी एक नई शुरूआत

धोनी के इन अल्फाज़ ने टीम इंडिया के रणबांकुरों में ऐसा जोश भरा कि..केपटाउन में प्रोटियाज मेन इन ब्लूज के कदमों में नजर आई...वर्ल्ड कप की ड्रीम टीम का सेलेक्शन होने के बाद...माही के मतवालों पर बेहतरीन प्रदर्शन का दवाब भी था...लेकिन धोनी के एक प्लान ने साउथ अफ्रीका पर बैक टू बैक 2 वनडे में  रोमांचक जीत हासिल कर सबको चौका दिया...
दरअसल धोनी ने... डरबन वनडे में 135 रनों से मिली करारी शिकस्त के बाद...टीम इंडिया की जीत के लिए बनाया था...एक survival plan...एक ऐसा प्लान जिसका भविष्य खुद धोनी को भी पता नहीं था....डरबन वनडे में मिली शर्मनाक हार से टीम इंडिया की वर्ल्ड कप  की तैयारियों पर क्रिकेट पंडितों के साथ साथ फैंस ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए थे....जो कि  कैप्टन कूल को कतई बर्दाश्त नहीं था....और धोनी ने अपने  survival plan के तहत अनहोनी को होनी करने की ठान ली...survival Plan...के जरिए टीम इंडिया को पुरानी लय पाने के साथ साथ फैंस का भरोसा भी हासिल करना था...धोनी के 11 सूरमाओं ने survival Plan के तहत पहले जोहानिसबर्ग की जंग को अपने नाम किया....फिर आई केपटाउन की बारी...जिसमें धोनी की आर्मी ब्रिगेड छोटा लक्ष्य पाने के बावजूद बिखर रही थी....बल्लेबाजों ने केपटाउन में ऐसा करिश्मा किया कि...जिसमें स्मिथ एंड कंपनी का गणित गड़बड़ा गया....जोहानिस बर्ग के बाद केपटाउन में भी आखिर वो लम्हा आया जब survival Plan ने अपनी मंजिल तक का सफर रोमांचक तरीके से पूरा कर लिया...बहरहाल धोनी के अनोखे प्लान के सामने प्रोटियाज बार बार ढ़ेर हो रहे ही..अब तो फैंस को यही उम्मीद है कि सीरीज में बचे दोनों वनडे में जीत हासिल कर धोनी वर्ल्ड कप की तैयारियों का पुख्ता सबूत पेश करेगें...क्योंकि फीवर 2011 का चैंपियन बनना है तो survival Plan पर भरोसा करना ही होगा...

स्पोर्ट्स खबर

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

फंस गए ओबामा नहीं, फंस गए रवीश !

IBN7 की स्पोर्ट्स डेस्क पर बैठे ..एक इंटर्न ने मुझसे पूछा कि ...सर आप क्या पहले से ही रिपोर्टर बनना चाहते थे.....मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं..फिर भी मैंने ... हां कहते हुए सिर हिला दिया......तो उसका अगला सवाल था ..कि आपने कब इसके बारे में सोचा .....उसका ये सवाल सुनते ही मैंने अपने होंठ दबा लिए ..और मैं सीधे ...अपने बचपन में पहुंच गया.....मेरी बड़ी दीदी ने मेरा नाम रवीश इसलिए रखा ..क्योंकि .....जब स्कॉवड्रन लीडर राकेश शर्मा चांद पर गए थे..तो उस मिशन के विंग कमांडर रवीश मलहोत्रा थे ...क्योंकि राकेश मेरे बड़े भाई का नाम था ..इसलिए मेरा नाम रवीश रख दिया गया....और मुझे बचपन से ही ये बताया गया कि जब कोई पूछे कि क्या बनना है ..तो मुझे कहना है SUADOURN LEADER .....हांलाकिं मुझे तो पता भी नहीं था कि ये होता क्या है ....फिर भी घर पर मेहमान आते और मेरा जवाब यही होता ....थोड़ा बड़ा होने पर मेरा इंटरेस्ट क्रिकेट की तरफ बड़ गया .....पापा से बैट लाने को जिद की ..तो अगले दिन वो बैट ले आए और कहने लगे कि तू डेविड बून है........ मैंने सोचा कि सचिन के बाद ..अगला नाम मेरा ही होगा ....पड़ोस में दो-तीन लोगों ने मेरे खेल की तारीफ भी कर दी..बस क्या था ...मुझे तो लगा कि ..मेरा जन्म ही क्रिकेट के लिए हुआ है.......हमने अपनी टीम बना ली ..बैट मेरा था तो कप्तान भी मैं बन गया....अब हर संडे को दूसरे मोहल्ले की टीम से मैच होता .....जल्द ही मुझे समझ आने लगा ..कि क्रिकेट मेरे बस की बात नहीं.....लेकिन हां पड़ोस के अंकल ने मुझे कॉमेंट्री करते हुए सुना और कहा - तू कॉमेन्टेटर बनेगा ...

इसके बाद जी...लॉन टेनिस की धुन सवार हो गई ..बोरिस बेकर ने विंबल्डन जीता .....और मुझ पर उसका जूनुन सवार हो गया.....फिर आंद्रे अगासी ..जिम कूरियर ..पीट सैम्प्रास.,..मेरे सपने में आने लगे......बैडमिटन के रैकेट से ही मैं टेनिस खेलने लगा..जब मेरी दीदी ने देखा कि मैने रैकेट खराब कर दिया है ..तो उन्होंने ...रैकेंट ही छुपा दिया.....कई दिनों तक ढूंडा लेकिन नहीं मिला ...तो मैंने सोचा छोड़ों ..कुछ नया करते हैं .....
1994 फुटबॉल वर्ल्ड कप शुरु हो गया.....और मोहल्ले के बड़े भाई लोग फुटबॉल की बातें करते थे ..अमर उजाला में फुटबॉलर्स की फोटो छपती थी....रोमारियो..बौजियो....सिलाइची..ना जाने क्या क्या....

और अब मैं भी पूरी तरह से ठान चुका था कि ...मुझे मैराडोना बनना है..पापा फुटबॉल ले आए....खेल शुरु हुआ ....हमारे घर में एक गैलरी थी...और उसकी दीवारों का सारा सीमेंट मैनें फुटबॉल मार-मार का निकाल दिया था ...उसके बाद मेरे घर वालों ने मेरी धुनाई करके ..मेरे फुटबॉलर होने का सारा भूत भी निकाल दिया.....
अब मैं क्या करता .....घर में टीवी देखता था .....दुरदर्शन पर परमवीर चक्र दोबारा शुरु हुआ ..बहुत जोश आया.....मन किया बड़ा होकर फौजी बनना है ...मेरे मामा भी कर्नल थे....वो तो मेरे हीरो हो गए....किताब में अब्दुल हमीद का चैपटर पढ़ा तो बस देशभक्ती का क्रेज हो गया........एक दिन मम्मी के साथ आर्मी कैंटिन गया...
वहां एक लियो की टॉय गन रखी थी ...गन बहुत बड़ी थी ....लेकिन बिलकुल असली थी .....मैंने मम्मी से कहा मुझे ये चाहिए ...मंहगी होने की वजह से मम्मी ने मना कर दिया.....मैं रोता रहा ...फिर मेरे मामा आए ..और उन्होने वो गन खरीदकर मुझे दे दी.....मैं सोता भी उसी गन के साथ था ..और स्कूल के बाद उसी के साथ खेलता.....स्कूल में भी कोई पूछता कि क्या बनोगे तो मेरा जवाब लेफिट्नेंट ही होता....
देखते देखते मेरे पापा के मार्गदर्शन में मेरा जनरल नॉलेज बहुत तेज हो गया....मैं स्कूल की क्विज को टॉप करने लगा...प्रिंसिपल ने स्टेज पर बुलाकर मुझे ईनाम दिया..और कंधे पर हाथ रखकर कहा ..आईएस बनेगा !......यानी एक और नया करियर ...इस दौरान प्राइम स्पोर्टस नाम से स्पोर्टस चैनल आ चुका था ..और उसमें हम लोग चारू शर्मा को माइक लेकर ...बोलते हुए देखते थे....मैंने भी अखबार और कागज से वैसा ही माइक बनाया....और उसे अपनी स्टडी टेबल के पास रखा करता था ..जैसे ही पठाई के बीच में कोई नहीं होता था ..मैं उसे हाथ में लेकर कॉमेंट्री करता था....लेकिन फिर भी दिमाग मे था कि आईएएस बनना है ....एक दिन हमारे उतराखंड की मंत्री इंदिरा ह्रदेश से मुलाकात हुई ..वो मेरी मम्मी को जानती थी..तो मझसे पूछा कि क्या बनोगे ..मैंने तपाक से जवाब दिया आईएएस .....वो चौंक गई ...बोली तुम जानते हो आईएएस क्या होता है...इसके लिए बहुत मेहनत करनी होती है ...मैंने दिल में सोचा पागल है ये ..मेरे बारे में कुछ नहीं जानती.....जब बन जाउंगा तब पता लगेगा......खैर वो तो चली गई लेकिन इस दौरान मुझे साइंस में इंटरेस्ट आने लगा .....मेरे सभी भाई-बहन सांस स्टूडेंट थे ..इसलिए घर में साइंस का माहौल था....फिजिक्स पढ़कर मुझे लगा कि साइंटिस्ट बनना क्या बुरा है....फिर उन दिनों आईआईटी वाले लोग आईएस बन रहे थे...तो लगा पहले इंजिनियरिंग ..फिर आइएएस..क्या आईडिया था.....12वीं खत्म हुई इंजिनिरिंग की कोचिंग शुरु.....पहले दो महीने बाद लग गया....नहीं यार ..मुझे नहीं करनी ...इंजिनियरिंग ....ङर वाले 50 हजार के करीब फीस भर चुके थे ..इसलिए कोचिंग चलती रही ..लेकिन दिल कही और था....खैर जगह-जगह काउंसलिंग के लिए गया.....लेकिन उतराखंड के पहाड़ों में बसे कॉलेजों से मैने तौबा कर ली.....और साफ-साफ कह दिया ..कि मुझे इंजिनियर नहीं बनना .....मुझे खबी भी पहाड़ों में जिंदगी बिताना पसंद नहीं था ...इसलिए मम्मी से कहा कि आपने जो पैसे कोचिंग में खर्च किए हैं वो वापस कर दूंगा.....इसके बाद मैंने कॉलेज में एडमिशन ले लिया....कॉलेड में एडमिशन के दौरान पहला साल तो ऐसे ही गुजर गया....अब कोई पूछता कि क्या बनना है ..तो मैं कहता पहले बीएसी कर लूं फिर सोचूंगा....सच कहं मैं उस दौरान लोगों से कतराने लगा था ....क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई सवाल नहीं होता था ...और मेरे पास कोई जवाब नही था...फर्स्ट ईयर तो ऐसे ही गुजर गया..सेकेंड ईयर में मैंने..फिर से क्विज ....भाषण ..जनरल नॉलेज शुरु कर दिया.....मैं मिमिकरी अच्छी करता था ..इसलिए कॉलेज में नाटक में भाग लेना का मुझे ..चांस मिल गया.,....अब मैं खुद नाटक लिखता ..और उसमें एक्ट भी करता.....कभी डॉक्टर बनता ..तो कभी गांधी जी.....अब दिन कट रहे थे.....लेकिन लक्ष्य का पता नही था....
मेरे पापा कि बहुत तमन्ना था कि मैं फौज में जाऊं ..उनका कहना था ...कि इसमें ट्रेनिंग के दौरान भी तनख्वाह मिलती है ..और ऑफिसर की लाइफ बेस्ट है......मैंने CDS का एक्जॉम दिया.....और क्वालिफाइ भी कर लिया....लेकिन फिर भी दिल कह रहा था...कि अगर फौज में जांगा ..तो मुझे कौन जानेगा....भगवान ने सुन ली ..और मैं फाइनल राउंड में बाहर हो गय़ा....पापा बहुत निराश हुए......लेकिन मुझे अब समझ में आ रहा था.....कि क्या करना है.... कॉलेज के नाटक में मैं रिपोर्टर बना.....और लोगों ने उसकी बहुत तारीफ की ...सबने कहा तुम रिपोर्टर बनो......मैंने गढवाल यूनिवर्सि का फॉर्म भरा ..हजारों स्टूडेंट्स में से मुझे तीसरा स्थान मिला...अब घर छोड़ने का वक्त आ गया.....लेकिन फिर वही चक्कर पहाड़ में कॉलेज था .और मुझे वहां नहीं रहना था ...मैंने फिर मना कर दिया.....अगले साल आईएमएमसी और भारतीय विघा भवन..और जामिया का फॉर्म लाया...लेकिन किस्मत ले गई....भारतीय विघा भवन....पापा ने रिजल्ट देखा ..फिर कुछ देर सोचा ..और बोले ...क्या बनेगा तू ? मैंने कहा रिपोर्टर......पापा बोले-- ठीक है तू यही बन ..लेकिन हां ...ये सोच ले ..कि तुझे नंबर वन बनना है ....आज मैं रिपोर्टर तो बन गया....और टीवी में देखने के बाद मेरे पापा को यही लगता कि ....अगर मैं रिपोर्टर बन सकता हूं ..तो कोई भी बन सकता है ....