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खेल से खेल तक
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मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

क्रिकेटिंग देशों के बोर्ड का इतिहास








खेल मंत्रालय औऱ बीसीसीआई आमने सामने

मुश्किल में BCCI
ज़रा सोचिए अगर सचिन तेंदुलकर देश के लिए ना खेलकर किसी कंपनी के लिए खेलें... औऱ महेन्द्र सिंह धोनी टीम इंडिया के कप्तान ना होकर सिर्फ... किसी कंपनी के कप्तान हों, तो क्या होगा । चौंकिए मत  क्योंकि अगर बीसीसीआई ने ... जल्द खेल मंत्रालय के साथ समझौता नहीं किया तो... टीम इंडिया देश की टीम ना होकर सिर्फ एक कंपनी की टीम रह जाएगी। दरअसल बीसीसीआई को  खेल मंत्रालय ने एक खत लिखकर ... अपनी शर्तें मानने का नोटिस भेजा है। खेल मंत्रालय चाहता है कि बीसीसीआई भी ... देश के तमाम दूसरे Sports Federations और Associations की तरह ... मंत्रालय द्वारा बनाए गए rules and regulations  औऱ working pattern की guidelines को follow करे। खास बात ये है कि इन निर्देशों को नहीं मानने पर बीसीसीआई के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है ... जिसके तहत खेल मंत्रालय से उसे मिली मान्यता रद्द हो जाएगी।  जिसके बाद BCCI की चुनी हुई टीम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी टूर्नामेंट में ... देश का प्रतिनिधित्व करने की हकदार नहीं होगी।
BCCI HISTORY
बीसीसीआई का गठन आज़ादी से पहले 1928 में हुआ था ... औऱ तभी से ये संस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का ... क्रिकेट के खेल में प्रतिनिधित्व करती है। हालांकि बीसीसीआई ने कभी भी किसी सरकार से आर्थिक मदद नहीं ली ... लेकिन इसके बावजूद खेल मंत्रालय की बीसीसीआई के लिए खास दलील है। खेल मंत्रालय के मुताबिक
1. बीसीसीआई भारत सरकार के रिकॉर्ड्स में एक National Sports Federations के तौर पर रजिस्टर्ड है। इसीलिए इसकी Parent Body खेल मंत्रालय को ही माना जाएगा।
 
2. सरकारी मान्यता के आधार पर ही बीसीसीआई देश में क्रिकेट के संचालन की monopoly बरकरार रख पाई है।
 
3. बीसीसीआई भी अन्य खेल संघों की तरह सरकार से टैक्स में रियायत लेती है। इसीलिए उसे मंत्रालय के निर्देश मानने ही होंगे।
 
4. किसी भी मैच या टूर्नामेंट के आयोजन के दौरान बीसीसीआई को सरकार से सुरक्षा के लिए पुलिस जैसी मुफ्त सुविधाएं दी जाती हैं।
 
5. Sports Goods के विदेशों से Import में भी बीसीसीआई सरकार से Custom Duty में रियायत हासिल करती है।

मौजूदा वक्त में बीसीसीआई को खेल मंत्रालय की तरफ से मान्यता ज़रूर प्राप्त है ... लेकिन हकीकत में ये मान्यता उसे ब्रिटिश काल में आज़ादी से पहले 1928 में ही मिल गई थी। तब बीसीसीआई को कलकत्ता क्रिकेट क्लब कहा जाता था 2009 तक बीसीसीआई की छवि भी साफ थी ...  लेकिन आईपीएल जैसे commercial event से हुई अरबों की कमाई के बावजूद ... जब बीसीसीआई ने सरकार को टैक्स देने से मना कर दिया ... तो सरकार के तेवर बदल गए। 2009 में पहले सरकार ने आईपीएल की कमाई पर ... टैक्स की रियायतें खत्म कीं ... औऱ बोर्ड को खेल मंत्रालय को अपनी Parent Body मानने के लिए खत लिखा। हालांकि ये बात और है कि महीनों तक बार-बार खत भेजने के बावजूद ... बीसीसीआई इस मुद्दे पर अभी तक चुप्पी लिए हुए है।

खेल मंत्रालय ने बेशक बीसीसीआई को अपनी Guidelines Follow करने के निर्देश देकर ... अपना रूख साफ कर दिया हो ... लेकिन बीसीसीआई भी क्रिकेट की सत्ता को इतनी आसानी से गंवाने के मूड में नहीं है...।  
बीसीसीआई पिछले 2 साल से मंत्रालय के निर्देशों को टालती आ रही है । ताज़ा खत के अलावा आखिरी बार ... बीसीसीआई को खेल मंत्रालय ने 2009 में खत लिखा था ... जिसका आज तक बीसीसीआई ने जवाब नहीं लिखा है। मान्यता के मसले पर बीसीसीआई सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए भी पूरी तरह तैयार है।  आजादी के बाद से देश की सरकारें बीसीसीआई के प्रति काफी नर्म रहीं ... 80 के दशक तक देश में क्रिकेट सिर्फ एक खेल था ... और हॉकी औऱ कबड्डी जैसे खेल क्रिकेट के बराबर लोकप्रिय थे। लेकिन 1983 वर्ल्डकप की जीत के बाद ... देश में क्रिकेट की पहचान बदल गई। 2000 आते-आते ये एक धर्म बना ... और 2008 में आईपीएल के बाद पैसा बनाने की फैक्ट्री।

दूसरे क्रिकेट खेलने वाले देशों का इतिहास
ऑस्ट्रेलिया
खेल मंत्रालय की दलील है कि दुनिया भर में ... मौजूद क्रिकेट बोर्ड्स को भी अपने देशों की स्थानीय सरकारों से मान्यता लेनी पड़ती है। हम आपको बताते हैं वर्ल्ड क्रिकेट के कुछ नामी क्रिकेट बोर्ड्स की सच्चाई ... बीसीसीआई के बाद दुनिया का दूसरा सबसे ताकतवर बोर्ड है ...
Cricket Australia ... जिसे Australian Cricket Board भी कहते हैं। इसका गठन 1905 में Australian Public Company limited के नाम से किया गया था। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलियाई सरकार के खेल मंत्रालय की तरफ से मान्यता के अलावा ... तमाम अन्य खेल संघों की तरह रियायतें भी मिली हुई हैं।  क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के किसी भी काम-काज में सरकारी दखल न के बराबर होता है । लेकिन हर दो साल में होने वाले Cricket Australia के अध्यक्ष पद के चुनाव ... सरकारी नियंत्रण में कराए जाते हैं।
साउथ अफ्रीका
वहीं South Africa में क्रिकेट के खेल के लिए काम कर रही गवर्निंग बॉडी Cricket South Africa पर ... अफ्रीकी सरकार का काफी नियंत्रण है। हालांकि ये एक Auto-nomous Body है ... लेकिन साउथ अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव यानि काले औऱ सफेद रंग में फर्क को दूर करने के लिए ... इसके working pattern को ... सरकार मान्यता दिलाना आवश्यक होता है।  यहां तक की नियुक्ति के बाद ... Office Bearers और टीम को चुनने वाले Selectors की लिस्ट भी ... सरकार के पास भेजी जाती है।

इंग्लैंड
इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड दुनिया का सबसे पुराना क्रिकेट बोर्ड है ... और 1997 तक ये एक Independent Body के तौर पर ... अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंग्लैंड का क्रिकेट में प्रतिनिधित्व किया करता था। लेकिन 1997 में इंग्लैंड के House Of Commons में उठी मांग के बाद ... ईसीबी को सरकार से औपचारिक मान्यता लेनी पड़ी।
बीसीसीआई की तरह ईसीबी भी ... इंग्लैंड सरकार से आर्थिक मदद नहीं लेती है। लेकिन ये भी हकीकत है ईसीबी के कामकाज में भी ... इंग्लैंड की सरकार का कोई दखल नहीं है।

पाकिस्तान
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की अगर बात की जाए तो ... पीसीबी तो पूरी तरह से ही पाकिस्तान सरकार के नियंत्रण में चलने वाली संस्था है । पाकिस्तान का राष्ट्रपति पीसीबी का Chief Patron होता है ... इतना ही नहीं पीसीबी के अध्यक्ष की नियुक्ति भी पाकिस्तान का राष्ट्रपति ही करता है। पीसीबी को भी पाकिस्तान में मान्यता के साथ-साथ टैक्स जैसी तमाम रियायतें मिली हैं ... लेकिन उस पर पाकिस्तानी सरकार के खेल मंत्रालय का कोई नियंत्रण नहीं होता।

बुधवार, 6 जनवरी 2010

हार से हुई साल की शुरूआत

हैप्पी नहीं इयर 20टेन



अपनी किस्मत की कहानी अगर कोई लिखना चाहता है तो वो उसी वक्त हार की ओर चल देता है । जीत उनके कदमों से कोसों दूर हो जाती है और मंजिल का तो अता-पता ही नहीं होता। मैं ये लाइन इसलिए लिख रहा हूं कि टीम इंडिया ने दावा किया था कि साल 20टेन की शुरूआत जीत के साथ करेंगे और दावा मजबूत भी दिखा क्योंकि बांग्लादेश में ट्राईसीरीज के दौरान टीम इंडिया अपना पहला मैच उस टीम के खिलाफ खेल रही थी जिसे 2009 के अंत में करारी शिकस्त दी थी। सबकी उम्मीदें भारत श्रीलंका के खिलाफ मुकाबले पर टिक गई। पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम इंडिया ने अच्छा खासा स्कोर भी खड़ा कर दिया। 279 रन बनाकर टीम इंडिया ने श्रीलंका को हराने का ख्वाब भी देख लिया लेकिन माही की सेना ये भूल चुकी थी की पिछला सीरीज उन्होंने बल्लेबाजों के दम पर जीता था न कि गेंदबाजों की बदौलत। 280 रनों का पीछा करने उतरी श्रीलंकाई टीम दिलशान,जयवर्धने जयसूर्या,मेंडिस और मुरलीधरन के बगैर ये मैच आसानी से जीत ले गई। और सेनापति धोनी के अलावा उनके रणवीर खिलाड़ी देखते ही रह गए। ये थी साल 20टेन की शुरूआत में ही मिली करारी शिकस्त। मैच से पहले क्रिकेट फैंस से जीत का दावा करने वाले धोनी मैच के बाद अपनी गलतियों पर ध्यान न देकर हार के लिए ड्यू फैक्टर को जिम्मेदार ठहराने लगे । ये वही धोनी की वाणी है जिनके बारें में कहा जाता है कि किस्मत उनके दरवाजे पर सजदा करती है। तो क्या धोनी की किस्मत साल के शुरूआत में उनसे रूठ गई। या फिर धोनी उस लम्हें को भूल गए जब माही ने अपनी सेना के साथ न जाने कितने किले फतह किए। खैर हमारे एमएस साहब को भी समझ आ गया कि किस्तम के वो कब तक खाते रहेंगे कभी तो किस्मत उनसे आगे निकलेगी और हुआ भी वही हैप्पी न्यू ईयर अभी शुरू हुआ भी नहीं होगा कि माही की किस्मत उनसे आगे निकलना शुरू कर दिया। साल की पहली हार पर एक कहावत याद आ जाती है जिसे खासकर ग्रामीण इलाके में काफी बोली जाती है-बोहनी ही अच्छा नहीं हुआ तो दिन क्या खाक बेहतर गुजरेगा। ये कहावत खासकर बनिया समाज के लोग ज्यादा उपयोग में लातें है । यही हाल टीम इंडिया का हुआ है जीत से बोहनी नहीं हुई तो क्या खाक आगे की कहानी पहले से बताएंगे। खैर टीम इंडिया को जो होना था सो हो गया लेकिन पलटवार करने में माहिर माही के मतवाले का भरोसा भी नहीं होता क्योंकि सेनापति महेंद्र सिंह धोनी कभी भी अपनी रणनिती की धार दिखा सकतें है। लेकिन हम तो टीम इंडिया के रणबांकुरों से यही उम्मीद करतें है कि वो भारतीय फैंस का मनोबल यूं न तोड़ें ।

रजनीश मेहता
स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट

रविवार, 22 मार्च 2009

सचिन जैसा पहले, अब भी वैसा ही........!




पुरानी बोतल में पुरानी ही शराब


टीम इंडिया के मास्टर बलास्टर सचिन तेंदुलकर ने हैमिल्टन टेस्ट में 160 रनों की शानदार पारी खेलकर ये साबित कर दिया कि उनके करियर की राह में कभी उम्र रोड़ा बन ही नही सकता।
हैमिल्टन टेस्ट में मिली जीत पूरी टीम इंडिया के लिए और भारत के क्रिकेट फैंस के लिए तो खास था ही इसके साथ –साथ क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन के लिए काफी यादगार रहेगा। 33 साल बाद किवी की सरजमीं पर मिली जीत से कप्तान माही इतने खुश हुए कि वो जीत का सेहरा मैन ऑफ द मैच रहे सचिन के सर ही बांध दिया। सचिन भी इस लम्हे को जीने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। और छोड़े भी क्यों क्योंकि ये प्रदर्शन सचिन के अब तक का न्यूज़ीलैंड दौरे पर सर्वश्रेष्ट प्रदर्शन था। सचिन को सन्यास लेने की सलाह देने वाले आलोंचको ने भी अपने सुर अब बदल लिए है औऱ मास्टर ब्लास्टर को लंबी रेस का घोड़ा बता रहे है।

खैर हैमिल्टन टेस्ट जीत कर तो टीम इंडिया ने इतिहास तो रच ही दिया इसके साथ साथ सचिन की बल्लेबाजी और जवां भी कर दिया है। सचिन के बारें में जितनी भी तारीफें की जाए वो कम है ...सचिन जैसा पहले थे अब भी वैसा ही है...यानि सचिन की बल्लेबाजी में जो अंदाज उनके डेब्यू टेस्ट मैच कराची में था वो अब भी बरकरार है..हालांकि भले ही सचिन अपने पहले टेस्ट मैच में ज्यादा रन स्कोर करने में कामयाब नहीं हुए थे लेकिन उनकी बल्लेबाजी का स्टाइल उस वक्त सब कुछ बयां कर गया। सचिन को अपना पहला टेस्ट शतक जमाने में करीब एक साल लग गए।
1990 में मैनचेस्टर में इंग्लैड के खिलाफ खेलते हुए सचिन दूसरी पारी में नाबाद 119 रन बनाए। तब से शुरू मास्टर का शतक बनाने का सिलसिला अब भी चल रहा है। पहला टेस्ट शतक 1990 में औऱ 42 टेस्ट शतक 2009 में यानि अपने 20 साल के अब तक के करियर में सचिन ने अपने अंदाज को नहीं बदला और न ही नाकामयाबी को कभी अपने ओऱ बढने दिया...इतिहास गवाह है जब जब सचिन पर सवाल उठा है तो मास्टर ब्लास्टर ने उसका जवाब अपने बल्ले से दिया है। अपने खेलने के अंदाज के बारे सचिन कहते है कि उनका अंदाज जो 20 साल पहले था अब भी वही है। इस 20 साल के दौरान क्रिकेट बदल गया, जुनून बदल गया, हालात बदल गए, अगर कोई नहीं बदला तो सचिन नहीं बदले। यानि हम कह सकते है कि पुरानी बोतल में पुरानी ही शराब।
-----रजनीश कुमार खेल पत्रकार

बुधवार, 18 मार्च 2009

न्यूज़ीलैंड की नई उम्मीद हैं राइडर


राइडर की रफ्तार

वन डे सीरीज़ शुरु होने से पहले न्यूज़ीलैंड टीम के कुछ खास बल्लेबाज़ों को ही टीम इंडिया के लिए खतरा माना जा रहा था...इसमें सबसे आगे नाम था विकेटकीपर बल्लेबाज़ ब्रैंडन मैंक्कुलम और आक्रामक बल्लेबाज़ रोस टेलर का...लेकिन सीरीज़ के परवान चढ़ते ही...एक तीसरा ही नाम सबके सामने आ गया ..जिसके बल्ले की रफ्तार ने राजधानी एक्सप्रेस ईशांत शर्मा को भी पटरी से उतार दिया....पिछले कुछ दिनों में भारतीय पेस बैटरी ने विरोधी बल्लेबाज़ों पर खासा दबाव बनाया है..लेकिन न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ जेस्सी राइडर के सामने टीम इंडिया के गंदबाज़ बेबस नज़र आए....राइडर सहवाग से खासे प्रभावित लगते है...और उनके शॉट खेलने का अंदाज़ बताता है कि ये बल्लेबाज़ किसी भी वक्त जोखिम उठाने की क्षमता रखता है...एक और खास बात ये है कि राइडर कभी भी गेंदबाज़ को उसके नाम के आधार पर सम्मान नही देते..तभी तो ऑकलैंड में राइडर ने ईशांत और ज़हीर को दिन में ही तारे दिखा दिए..
हालांकि लोगों को लगा कि राइडर की रफ्तार सिर्फ क्रिकेट के छोटे फॉर्मेंट तक ही सीमित है और इस बल्लेबाज में विकेट पर ज्यादा देर तक टिकने की काबिलियत नही है...इसलिए राइडर टेस्ट की चढ़ाई नही कर पाएंगे...लेकिन भारत के खिलाफ पहले ही टेस्ट में राइडर ने अपने आलोचको के मुंह में ताला जड़ दिया...विपरीत परिस्थिति और भारतीय गेंदबाज़ों की कहर बरपाती गेंदें ...राइडर के हौसंले को डगमगा नही सकी...राइडर ने धैर्य से बल्लेबाज़ी करते हुए टेस्ट क्रिकेट में अपना पला शतक पुरा किया....हालांकि नवर्स नाइंटीज के स्कोर पर पहुंचने के वक्त कप्तान धोनी ने राइडर के दुश्मन ईशांत को गेंदबाज़ी पर लगाया...पर राइडर नें संयम न ही खोया ...और चौक्के के साथ अपना शतक पूरा कर लिया....राइडर की ये पारी उनके विश्वास को जरुर बढ़ाएगी..और आने वाले वक्त में उनका बढ़ता आत्मविश्वास टीम इंडिया के लिए बड़ा खतरा हो सकता है...इसके अलावा अगर राइडर आईपीएल के सीज़न -2 में खेलते हैं...तो भारतीय क्रिकेट फैंस के लिए उनकी बल्लेबाज़ी किसी ट्रीट से कम नही होगी...साथ ही पिछले सीज़न फ्लॉप रही बैंगलोर रॉयल चैंलेजर्स को राइडर के रुप में एक मैच विनिर भी मिल जाएगा ।

---- रवीश बिष्ट खेल पत्रकार

बुधवार, 4 मार्च 2009

इंडीज़ के बल्लेबाज़ों की याद दिलाते हैं यूसुफ


ही-मैन यूसुफ पठान


यूसुफ पठान की बल्लेबाज़ी में दिन ब दिन निखार आता जा रहा ...है...यूसुफ ने एक ऐसे बल्लेबाज़ को तौर पर टीम इंडिया में जगह बना ली है...जो कभी भी मैच का पासा पलट सकता है....यूसुफ की खास बात ये है ..कि ये बल्लेबाज़ ...किस, भी गेंदबाज़ के आगे शॉट लगाने से नही डरता .....और मैच की कोई भी परिस्थिती हो...यूसुफ को अगर शॉट लगाने हैं तो वो जरुर खेलेंगे...यूसुफ की कद-काठी और उनका बैटिंग स्टाइल..सत्तर और अस्सी के दशक में खेलने वाले बेस्टइंडिज़ के बल्लेबाज़ों की याद दिलाता है... उस दौरे में पूरे वर्ल्ड क्रिकेट में इंडिज़ के बल्लेबाज़ो को जलवा था..वो किसी भी गेंदबाज़ का बुरा सपना हुआ करते थे...और गेंद को मैदान से बाहर पहुंचाना तो उनके बाएं हाथ का खेल था....यूसुफ पठान की बल्लेबाज़ी में भी ये सारी बातें नज़र आती है....आईपीएल फाइनल में जिस तरह से बड़े पठान ने वर्ल्ड क्रिकेट के सबसे कंजूस गेंदबाज़ मुरलीधरन पर छक्के लगाए थे...वो ये बताने के लिए काफी था...कि यूसुफ पर नाम का असर नही पड़ता ..वो मुरली को भी ऐसे खेल रहे थे..जैले कोई मंझा हुआ बल्लेबाज़ किसी नवोदित गेंदबाज़ को खेलता है.. इसके बाद यूसुफ का जलवा श्रीलंका दौरे पर भी देखने को मिला जब वन डे और फिर एकलौते ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच में यूसुफ ने अपनी पावर हिटिंग से मैच को टीम इंडिया की झोली में डाल दिया....यूसुफ बेशक तकनीक से दक्ष बल्लेबाज़ ना हो लेकिन बढ़ती ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट और वन डे क्रिकेट के लिए पठान एक लंबी रेस का घोड़ा है...


रवीश बिष्ट..खेल पत्रकार


कहां गई धोनी की हिटिंग ?


सिक्सर हीरो बने सिंगल किंग


कभी गली क्रिकेट से छक्के की बरसात करके टीम इंडिया में जगह बनाने वाले टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ...अब अपने खेल के विपरीत बल्लेबाज़ी करते हुए दिखाई दे रहे है ...धोनी ने जब इंटरनेशनल क्रिकेट में एंट्री की थी...तो उनके बड़े-बड़े हिट...क्रिकेट फैंस में काफी पॉपुलर हुआ करते थे...भलो कौना भूल सकता है जयपुर और उसके बाद विशाखापटनम में खेली गई उनकी पारियों को ...धोनी के बल्ले से रन ऐसे निकल रहे थे..मानों कोई मशीन गन से गोलियां बरसा रहा हो...धोनी ने गिलक्रिस्ट का रिकॉर्ड तोड़ा...और छक्के के साथ टीम इंडिया को मैच जिताना तो धोनी का अंदाज़ ही हो गया था...लंबी-लंबी जुल्फें...और लंबे-लंबे शॉट्स...धोनी को टीम इंडिया का नया सिक्सर बॉय कहा जाने लगा...शुरुआत में धोनी का स्ट्राइक रेट भी करीब 100 के आस-पास हुआ करता था...लेकिन जैसे ही धोनी के कंधो पर कप्तानी की ज़िम्मेदारी ...दी गई...टीम इंडिया का ये हार्ड हिटर सिंग्लस में खेलता नज़र आया...यानी धोनी के बल्ले से रन सिर्फ सिंगल्स में निकल रहे थे....छ्क्के तो छोड़िए ..चौक्के निकालना भी धोनी के लिए मुश्किल हो रहा है...क्या धोनी के खेल में आया बदलाव..कप्तानी की ज़िम्मेदारी की वजह से है...या फिर धोनी अब अपने खेल को लेकर ज्य्दा ही सतर्क हो गए है.....कहीं इसकी एक वजह आईसीसी रैंकिंग तो नही ..जिसमें करीब दो महीने से धोनी का राज चल रहा है.....धोनी के खेल को देखकर लग रहा है...कि वो आखिरी में नॉटआउट रहकर अपने औसत को भी बेहतर बनाने में लगे हैं....वेलिंग्टन टी-ट्वेंटी में धोनी की धीमी पारी ने दर्शकों को भी चौंका दिया...और दर्शकों ने पोस्टर के जरिए धोनी को ये संकेत दिए कि ये टेस्ट मैच नही है...साफ है धोनी की बैटिंग स्टाइल में आए बदलाव से क्रिकेट फैन भी नाराज़ हैं...और अब वो धोनी को भी इस बात का अहसास कराना चाहते हैं....धोनी की बैटिंग स्टाइल किसी की कॉपी नही है...नाही...उनके शॉट्स को किसी क्रिकेट बुक में देखा जा सकता है....लेकिन क्रिकेट फैंस अपने ही अंदाज़ से बॉल को हिट करने वाले इस बल्लेबाज़ से पुराने जलवे की उम्मीद कर रहे हैं...धोनी कुछ करो !
रवीश बिष्ट




टीम इंडिया की सुरक्षा बढ़ी

धोनी ब्रिगेड के लिए सुरक्षा ब्रिगेड।

लाहौर में हुआ हमला....

और क्रिकेट वर्ल्ड आ गया सकते में ....
क्या आतंकवादियों के निशाने पर अब क्रिकेटर्स हैं....
श्रीलंकाई टीम पर हुआ हमला...तो इसी ओर इशारा कर रहा है...पाकिस्तान में खेल भावना का संदेश देने आई...श्रीलंकाई टीम तो किसी बड़ी दुर्घटना से बच गई.... लेकिन इस घटना ने वर्ल्ड क्रिकेट को सतर्क तो कर ही दिया है....बीसीसीआई भी जानती है...कि आतंकवाद के हाथ किसी सीमा के मोहताज नही है....और इसलिए न्यूज़ीलैंड में खेल रही टीम इंडिया को बेहतर सुरक्षा मुहैया करना बेहद जरुरी है....बीसीसीआई से पहले टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी कड़ी सुरक्षा की मांग कर चुके हैं...लेकिन धोनी की चिंता आतंकवाद को लेकर नही बल्कि मैदान पर टीम इँडिया पर बोतल फेंकने वाले दर्शकों से थी....वहीं श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर हुए हमले ने वर्लड क्रिकेट की नींद उड़ा दी हैं.....और न्यूज़ीलैंड क्रिकेट बोर्ड ने बीसीसीआई की बात मानते हुए ...टीम इँडिया की पुख्ता सुरक्षा की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं.....टीम इंडिया को न्यूज़ीलैंड में अभी 4 और वन डे और 3 टेस्ट मैच खेलने हैं ..इसके अलावा टेस्ट टीम में शामिल टीम इंडिया के 6 खिलाड़ियों को न्यूज़ीलैंड में घरेलू क्रिकेट भी खेलनी है..जाहिर हैं....टीम इंडिया के न्यूज़ीलैंड दौरे की अभी केवल शुरुआत ही हुई है...और टीम इँडिया को न्यूज़ीलैंड में काफी वक्त गुज़ारना है....ऐसे में बीसीसीआई को इस बात पर भी ध्यान देना होगा...कि विदेंशी दोरे पर टीम इंडिया की पुख्ता सिक्योरिटी...दौरा खत्म होने तक कायम रहे....और इसे सिर्फ कुछ दिनों की बात मानकर सिक्योरिचटी में किसी भी तरह की ठील ना दी जाए......साथ ही बीसीसीआई को खिलाड़ियों को भी ज्यादा सुरक्षा के बीच भी बेहतर माहौल देने की कोशिश करनी होगी..जिससे टीम के खेल पर असर ना पड़े .


-----रविश बिष्ट खेल पत्रकार

हमले का आईपीएल पर असर




क्या होगा IPL का ?




पाकिस्तान की सरज़मी पर श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हुए हमले की गूंज चारो और सुनाई दे रही है...और बीसीसीआई की मेगा लीग आईपीएल पर भी इन हमलों का असर दिखाई दे रहा है। आईपीएल के आयोजन को लेकर आशंकाए इस लिए भी ज्यादा जताई जा रही है क्योंकि उसी दौरान देश में लोकसभा चुनाव है और सुरक्षा के लिहाज से क्या भारत दो मेगा EVENT एक साथ संभाल सकता है।
क्रिकेट के काले दिन के बाद ...
अब आईपीएल पर आ गई है ...
आयोजन की आफत ...
क्योंकि ...
फिर निशाने पर है क्रिकेट ...
जी हां ... पाकिस्तान में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला क्या हुआ वर्ल्ड क्रिकेट सकते में आ गया है ... और अब इस हमले की गूंज का असर पड़ रहा है ... बीसीसीआई की मेगा लीग यानि इंडियन प्रीमियर लीग पर । मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद वैसे ही देश में बड़े खेल आयोजनों के दौरान विदेशी खिलाड़ियों की सुरक्षा पर चिंता बढ़ रही थी। लेकिन अब गृह मंत्रालय ने भी ये कहते हुए साफ कर दिया है कि चुनावी फिज़ा में आईपीएळ का सीज़न-टू आयोजित करना सुरक्षा के मद्देनज़र बड़ जुआ हो सकता है। आगामी दो महीनों के दौरान ऐसा वक्त रहेगा जब सत्ता के गलियारों में पहुंचने के लिए ... देश के कोने-कोने में राजनेता मतदाताओं के पास अपने प्रचार और रैलियों में व्यस्त रहेंगे। वहीं दूसरी ओर यही वो वक्त रहेगा जब इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान ... देश के करीब आठ-आठ बड़े शहरों में क्रिकेट अपनी करवट ले रहा होगा। ज़ाहिर है चुनावों के साथ-साथ क्रिकेट के मेगा टूर्नामेंट में सुरक्षा को चाक-चौबंद रखना सरकार के लिए सिरदर्दी की वजह बना हुआ है। ऐसे में मुमकिन है कि आईपीएळ के तय कार्यक्रम में बदलाव कर दिया जाए। लेकिन बदकिस्मती ये है कि लीग के 40 मैचों के आयोजन के लिए बोर्ड को साल में दूसरा कोई मौका दिखाई नहीं दे रहा। मतलब साफ है कि दूसरे सीज़न में आईपीएळ के टलने का मतलब होगा नुक्सान ही नुक्सान... जो एक अनुमान कते मुताबिक करीब 1000 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकता है। साफ है कि सीज़न-टू में आईपीएल के आकाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ और सिर्फ आयोजन रहेगा ... क्योंकि अब ये मुद्दा पैसों के साथ-साथ ... सबके लिए साख का सवाल भी बन चुका है।


----रविश बिष्ट


खेल पत्रकार