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खेल से खेल तक

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

वेस्टइंडीज़ एक इम्तिहान एक चैलेंज पार्ट-3



वेस्टइंडीज़ एक इम्तिहान एक चैलेंज पार्ट-3



वेस्टइंडीज़ एक इम्तिहान एक चैलेंज पार्ट-3
बारबाडोस पहुंचे ..तो रेसोर्ट में एंट्री ली ..समुद्र के क्या शानदार रिसोर्ट था...बेहद खूबसूरत ...रिसोर्ट में हर चीज़ थी ...आप अपनी फैमिली ...को लेकर यहां आ सकते हैं...हनीमून के लिए तो ..इससे बढिया जगह शायद ना मिले....
किचन में कुकिंग का सारा सामान था.....हमें लगा बाहर खाने की झंझट भी खत्म.....अगले दिन भारतीय टीम को बारबाडोस आना था ....हमने टैक्सी बुक की ...और एयरपोर्ट जाने लगे....रास्ते में ड्राइवर ने हमें बताया कि एयरपोर्ट के पास मैल्कम मार्शल की कब्र हैं ..और कब्र के पास बने चर्च से मार्शल का पुराना नाता था इसलिए उसे वहीं दफनाया गया....मैंने.ड्राइवर से कहा कि मुझे वहीं जाना है ..जीतू भाई के बेहतरीन कैमरा वर्क से मैंने उस दिन
का स्टोरी की ...और बाद में एयरपोर्ट पहुंचा....टीम गाडी में आई और निकल गई ...बस यही एक शॉट मिला ..लेकिन मार्शल की स्टोरी ऑफिस में सबको पसंद आई ...उसे स्पोर्ट्स टीम ने बहुत बढ़िया एडिट कराया था....इसके अगले दिन मैंने टीम होटल का रुख किया...जहां वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने तमाम टीम आई थी.....खुद को ट्यूरिस्ट बताकर हम होटल में घुसे ..लेकिन कोई खिलाड़ी नहीं दिखा...हां लंदन से आए कुछ भारतीय होटल से सटे बीच
में क्रिकेट खेल रहे थे ....मुंझे नहीं पता कि जिन लोगों से मैं मिलने जा रही हूं ..वो इस टूउर में मेरे लिए सबसे अहम साबित होंगे ..और शायद मैं उन्हे कभी नहीं भूल पाउंगा.......रवि, भवेश ...और जिग्नेश के साथ क्रिकेट खेलकर मैंने बीच क्रिकेट की स्टोरी तो कर ली ...लेकिन अभी इन तीनों के जरिए मेरा
मास्टर स्ट्रोक बाकी था....हम रोज़ टीम इंडिया की प्रैक्टिस को कवर करने के बाद....टीम होटल आते ..और रोज किसी ना किसी टीम के नहाने के शाट्स जरुर लेते .....बिलकुल पापाराजी( वो पत्रकार जो लोगों की निजी तस्वीरें उतारते हैं) हो गए थे...खैर बारबाडोस से हमें फिर सेंट लूशिया जाना था ..और
नेट पर सस्ते दामों पर एक ही होटल मिला ...हमने फोन पर वही बुक करा लिया......सेंट लूशिया पहुंचने पर पता चला कि ..ये होटल ...30 मील की दूरी पर पहाड़ों में है......और वहां से स्टेडियम पहुंचने में 2 घंटे लग जाएंगे .....कैंसेंल कर नही सकते थे ..क्योंकि 120 डॉलर जाते .....जीतू भाई बेहद नाराज
थे कि मैंने क्या कर दिया...मुझे खुद अफसोस हो रहा था ..लेकिन क्या करता ......हां मैनें उस होटल की दो दिन की बुकिंग को कैंसल कर सिर्फ एक दिन का कर दिया.......और एयरपोर्ट पर मौजूद अधिकारियों ने हमारे लिए स्टेडियम के पास ..एक होटल भी बुक करा दिया........हम पहाड़ी वाले रास्ते से उस होटल में पहुंचे...मुझे रास्ते में उल्टी भी आ गई ..हालत खराब हो गई थी ..सोच रहा था कि ये मैंने क्या कर दिया.....फिर भी उस होटल में पहुंचकर
मुझे पता लगा कि ...कि जिसे मैं अपनी बेवाकूफी समझ रहा हूं..वो मेरे लिए लाइफटाइम चांस बनने वाला है ....दुनिया का एकमात्र ड्राइव-इन ज्वालामुखी (ला सूफियरे) मेरी नजरों के सामने था ..और होटल से सिर्फ 10 मिनट की दूरी पर ...सुबह होते ही हम वहां पहुंच गए .....एक रोमांचित कर देने वाली जगह ...सिर्फ सुना था ..देखा पहली बार ....पहाड़ से निकलता लावा........हर तरफ धुंआ ही धुंआ.....मेरे मुंह से निकला क्या स्टोरी है ब़ॉस......इसके बाद बॉटनिकल गार्डन गए ..जहां वेस्टइंडिज से मिलने वाले हर फूल मौजूद थे.......दो बेहतरीन स्टोरी करने के बाद ......अब मूड सोने का था ..और ला सूफियरे को अलविदा कहने का .......वहां से लौट कर मैं बहुंत खुश था ..रास्ते में समुद्र पड़ा ..जिसमें एक बड़ा क्रूजर खड़ा था.......मैंने गाड़ी रुकवाकर
..फोटो खिंचवाई ..और हम अपने नए होटल में पहुंच गए....

वेस्टइंडीज़ एक इम्तिहान एक चैलेंज पार्ट-2



वेस्टइंडीज़ एक इम्तिहान एक चैलेंज पार्ट-2



वेस्टइंडिज की यात्रा मेरी जिंदगी की पहली हवाई यात्रा थी इसलिए मन में काफी डर था ..लेकिन जैसे ही जहाज में बैठा...कुछ रोमांचित सा लगने लगा ..जहांज ने टेक ऑफ किया ...तो रोमांच की सारी सीमाएं ही टूट गई.......ऐसा लगा कि ...कि दुनिया कितनी छोटी है ........विंडो सीट से तो नजारा ही अद्भुत था.....सब कुछ छोटा होता जा रहा था......सिर्फ लाइटें नजर आ रही थी ....और कुछ मिनटों की यात्रा के बाद ......हम कब पाकिस्तान पहुंच गए
पता ही नहीं लगा ....हम बादलों के उपर आ गए थे.....और इसके बाद तो ..मैंने नीचे देखना ही छोड़ दिया... यात्रा के साथ साथ समय भी बदल रहा था .और देखते ही देखते हम दुबई पहुंच चुके थे ....यहां से हमें लंदन की उड़ान भरनी थी .......दुबई एक शानदार जगह है .....रेगिस्तान के बीच बिलकुल
महल से लगता हैं....सड़के चौड़ी-चौड़ी ..और एयरपोर्ट एकदम भव्य....लेकिन लंदन तो जन्नत जैसा था ...साफ सफाई ...हरियाली...और वातावरण में ठंड....लंदन तक का सफर एमिरेट्स से कटा था ..इसलिए कोई खास परेशानी नहीं हुई ...क्योंकि सुविधाएं भी अच्छी थी ..और एयरहोस्टेस्स भी ( हाहाहा)
खैर लंदन से हमें बारबाडोस जाना था ...लेकिन ब्रिटिश एयरवेज ने हमारे सामान को एक्सट्रा लगेज करार दे दिया और हमें 70 डॉलर भरने को कहा गया......हमने अपना ट्रैवल कार्ड का इस्तेमाल करना चाहा ..तो उसने भी धोखा दे दिया.......एटीएम मशीन ने कार्ड को स्वीकार करने से इंकार कर दिया.....हमारे फोन भी बंद थे.....इसके बाद अपनी जेब से पैसा भरने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया ..मैंने और जीतू भाई ने अपनी पर्सनल मनी को
वहां जमा करा दिया ....और ब्रिटिश एयरवोज की फ्लाइट में सवार हो गए.....
ये सफर मेरे लिए काफी कष्टकारी रहा ..क्योंकि ...मैं एक शाकाहारी इंसान हूं...और ब्रिटिश एयरवेज का नियम है कि शाकाहारी खाने के लिए पहले से लिखना होता है .......इसलिए अब मुझे ...ये सफर भूखे ही बिताना था ....हां ये एयरलाइन उन लोगों के लिए बिलकुल फिट है ...जो वाइन का मजा लेना
चाहते हैं ..दुर्भाग्यवश मैंने ऐसा कोई शौक नहीं पाला था ...इसिलए मुझे तो कॉफी और चॉकलेट से ही पूरा हवाई रास्ता तय करना पड़ा........जब हम बारबाडोस पहुंचे तो मैं हैरान रह गया कि ..ऐसा भी कोई एयरपोर्ट हो सकता है..बिलकुछ खाली ...खुला खुला सा...... लग रहा था ..कि हम अलग ही
दुनिया में आ गए हैं.... ....भारत का पहला मैच सेंट लूशिया( वेस्टइंडीज का एक अलग आइलैंड) में था .....इसलिए हमें ...बारबाडोस से भी आगे जाना
था ...मेरे साथ ट्रैजिडी ये थी ...कि अपना ना ..होटल बुक था ..और ना ही टूर्नामेंट के लिए इंटरनल फ्लाइट्स......फिर भी मैं ..पासपोर्ट के साथ अभी सिक्योरिटी क्लिरेंस के लिए रुका ही था ..कि किसी ने मुझे आवाज दी ......मुझे लगा कि यहां मुझे कौन जानता है ......तो देखा हर्षा भोगले थे ......मेरे लिए हर्षा इसलिए खास हैं क्योंकि मैंने अपने करियर की शुरुआत उन्ही के क्विज शो से की थी ....अब हर्षा भी हमारे साथ हो लिए ..और हम लोग
एयरपोर्ट पर क्रिकेट की बातें करने लगे .......इसी दौरान टाइम्स नाउ के बोरिया मजूमदार भी वहां पहुंच गए .......और हमारा अच्छा कास टाइम पास होने लगा ..अचानक बोरिया ने मुझसे पूछा ..कि ..क्या मैंने होटल और इंटरनल प्लाइट बुक करा लिए हैं....एक पल के लिए मानो मेरी धड़कन रुक गई ....मैंने झूठ में हां कह दिया......उसने कहा - "अच्छा किया ..क्योंकि अब नहीं मिलने वाली ..सब फुल हो चुकी है ......." मेरे तो पैरों तले धरती ही खिसक गई फिर भी मैनें...दिल पे हाथ रखा और कहा ..ऑल इज वेल.....
सेंट लूशिया में हमने अपने रहने के इंतजाम की बात इंडिया टीवी के सीनियर रिपोर्टर ..रोहित विश्वकर्मा से की थी ....इसलिए वहां पहुंचते ही ...उन्हें कॉल किया...रोहित इतने अच्छे इंसान थे ..कि उन्होंने एक टैक्सी ड्राइवर को एयरपोर्ट पहले से ही भेजा हुआ था....लेकिन मैंने ..पहले इंटरनल टिकट बुक कराना जरूरी समझा.....मैच के आगे-पीछे की डेट के साथ ..हमें बुकिंग मिल गई ...लेकिन किस्मत इतनी खराब थी कि एयरपोर्ट का एटीएम ही खराब
था ...इसलिए टिकट यहां भी कन्फर्म नहीं हो सकी....खैर हम अपने होटल पहुंचे....और 10 मिनट की दूरी के लिए 30 डॉलर देते ही मुझे अहसास हो गया ...कि वेस्टइंडीज़ कितना मंहगा है.....रूम अच्छा था ...नेट का कनेक्शन भी था ..और हमने सिर्फ चिप्स खाकर सोना ही बेहतर समझा...सुबह नींद जल्दी खुल गई.....हमने सोचा कि सबसे पहले ...सिम ...प्लग सॉकेट...और डाटा कार्ड खरीद लें.....साथ ही हमें एयर टिकट भी बुक करानी
थी........हमारा ट्रैवल कार्ड चलने लगा था ..और हमने अपनी एयरटिकट बुक करा ली ...इसके बाद हम ..सेंट लूशिया के स्टेडियम पहुंचे ....और वहां पर पिच के बॉक थ्रू ..के अलावा अफगानिस्तान के खिलाड़ियों का इंटरव्यू भी किया.....भारतीय टीम दूसरी जगह प्रैक्टिस कर रही थी ...भारत के तमाम पत्रकार वहीं थे ......हम भी वहां पहुंच गए .....बाकी पत्रकार हमें हैरानी से देख रहे थे....कि लो ये लाइव इंडिया वाले भी यहां आ गए.....उनका नजरिया
हमारी तरफ बिलकुल अच्छा नहीं था.....मुझे सबकुछ अजीब लग रहा था.....मन कर रहा था ..कि वापस भारत आ जाऊं ......ये मेरे बस की चीज़ नहीं है ...फिर लगा ....कि अगर इतनी जल्दी हार मान ली ..तो खुद को माफ नहीं कर पाउंगा....दिन बीतते जा रहे थे ....और हम रोज दिन गिनते थे ..कि एक एक दिन और कम हो गया......अब हम जल्द भारत लौट आएंगे .....सेंट लूशिया में खाने की बहुत दिक्कत हो रही थी ..रोज रात को भारत से ले गई मैगी खाकर हम बोर हो चुके थे ..पर कुछ खा नहीं सकते थे ....क्योंकि पैसे खत्म हो जाने का डर
था ....इसलिए हम रोज रात को स्टेडियम से पानी की बोतल लेकर आते थे .....क्योंकि वहां मिनरल वॉटर भी 3 यूएस डॉलर का मिलता था ...थक हारकर मुझे अंडा भी खाना पड़ा लेकिन जब 4 अंडों का बिल 48 डॉलर आया ..तो हमें लगा कि अब कुछ और ही सोचना पडेगा ....सेंट लूशिया में भारत ने एक आसान मैच जीता ....औमर अब टीम इंडिया का अगला पड़ाव ....बारबाडोस था .....हमारी बुकिंग मैच के दिन की थी ...लेकिन अचानक फोन पर पता चला कि ... ....एक दिन पहले कि 2 सीटे खाली है ......यहां तक कि बारबाडोस में हमें होटल भी मिल गया....वो भी
ठीकठाक दामों पर .....रास्ता साफ था ....और भगवान हमारे साथ....

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

एशियाड की नजर में भारत


एशियाड के इतिहास के आइने में भारत


जापान के टोक्यो में 1958 में खेले गए तीसरे एशियाई खेलों में पहली बार हाकी को शामिल किया गया, जब भारत और पाकिस्तान के बीच फाइनल मुकाबला ड्रा रहने के बावजूद गोल औसत में पिछड़ने के कारण बलबीर सिंह सीनियर की कप्तानी वाली भारतीय टीम को रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा।

दक्षिण कोरिया के खिलाफ 2-1 से जीत दर्ज करने वाली भारतीय टीम गोल औसत में पाकिस्तान से पिछड़ गई। फाइनल मैच गोल-रहित ड्रा रहा लेकिन पाकिस्तान को बेहतर गोल औसत के आधार पर स्वर्ण पदक मिल गया। इन खेलों में भारत का जलवा एक बार फिर ट्रैक और फील्ड पर दिखा। फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह के लिए यह साल बेहतरीन था और कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों के साथ एशियाड में भी उन्होंने सोना बटोरा। पुरुषों की 200 मीटर और 400 मीटर दौड़ क्रम से 21.6 और 47 सेकंड में पूरी करने वाले मिल्खा ने स्वर्ण पदक जीता। भारत की झोली में आए पांचों स्वर्ण पदक एथलेटिक्स से ही थे। इसके अलावा भारत ने 1958 एशियाड में चार रजत और चार कांस्य समेत 13 पदक अपने नाम किए।

त्रिकूद में मोहिंदर सिंह गिल ने 15.62 मीटर की दूरी तय करके स्वर्ण पदक जीता तो गोलाफेंक में प्रदुम्न सिंह [15.04 मीटर] ने बाजी मारी। चक्काफेंक में बलकार सिंह 47.66 मीटर के साथ पहले स्थान पर रहे।

महिलाएं भी पदक जीतने के मामले में पीछे नहीं रही। स्टेफी डिसूजा ने 200 मीटर दौड़ में रजत पदक हासिल किया जबकि भालाफेंक में एलिजाबेथ डेवनपोर्ट ने दूसरा स्थान हासिल किया। महिलाओं की चार गुणा 100 मीटर रिले टीम ने कांस्य पदक अपने नाम किया। भारत को एथलेटिक्स में पांच स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य पदक मिले। मुक्केबाजी में भी भारतीयों का प्रदर्शन अच्छा रहा। लाइटवेट [60 किलो] वर्ग में सुंदर राव को कांस्य पदक मिला। वहीं मिडिलवेट [75 किलो] में हरि सिंह ने चांदी का तमगा जीता। फुटबाल में भारत पदक से चूककर चौथे स्थान पर रहा। ग्रुप चरण में भारतीय टीम दूसरे स्थान पर रही। क्वार्टर फाइनल में उसने हांगकांग को 5-2 से हराया जबकि सेमीफाइनल में कोरिया से 1-3 से हार गया। कांस्य पदक के लिए प्लेआफ मुकाबले में भारत को इंडोनेशिया के हाथों 1-4 से पराजय का सामना करना पड़ा।

रविवार, 18 जुलाई 2010

रवीश.....एक उड़ान...हमारे लिए...सबके लिए



रवीश...एक उड़ान

उतराखंड का एक लड़का जब अपनी राजनीतिक विज्ञान में एम ए की पढ़ाई पूरी करके दिल्ली आया..तो उस वक्त मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने के फैसले को शायद की किसी ने सही बताया होगा...आम इंसान की जिंदगी में एक मंजिल होती है...लेकिन ये लड़का अपनी सपनों की पूरी दुनिया लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में अनजाने से कदम रख दिया...लेकिन उतराखण्ड का ये लड़का अपनी मंजिल को पाने के लिए जिद कर बैठा...भारतीय विघा भवन से रेडियो एण्ड टेलिविजन में पत्रकारिता करने वाले रवीश बिष्ट आज नई उड़ान भर रहें हैं । मैं रवीश बिष्ट की निजी जिंदगी के बारें में ज्यादा नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूं कि जब रवीश भारतीय विघा भवन में अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर रहे थे उन दिनों मशहूर टेलीविजन एंकर और बेहतरीन जर्नलिस्ट अभिसार शर्मा ने उनके एक सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि "रविश तुम एक दिन बहुत बड़े जर्नलिस्ट बनोगे " ये बात शायद आप सभी को पता नहीं होगा लेकिन ये हकीकत है कि आज अभिसार के बराबर तो नहीं बल्कि उनकी टक्कर का एंकर रवीश जरूर है। रवीश आपको ढ़ेर सारा प्यार आपका ब्लॉग पार्टनर

बुधवार, 30 जून 2010

वेस्टइंडिज़ - एक इम्तिहान एक चैलेंज़

मेरे लिए वेस्टइंडीज़ का सफर क्लास थर्ड से शुरु होता है.....हमारी हिन्दी की किताब में वेस्टइंडीज़ नाम का चैप्टर था....और हमारी मैडम ने पूछा कि क्या किसी ने वेस्टइंडीज़ का नाम सुना है ....क्लास में किसी को पता नहीं था....लेकिन मैंने हाथ उठा दिया... और बताया कि मैं जानता हूं...टीचर ने पूछा कैसे ? मैंने कहा- ये टीम क्रिकेट खेलती है ....टीचर ने कहा बिलकुल सहीं......जब मैं अपने अतीत को याद करता हूं तो पहला मैच मुझे वेस्टइंडीज़ का ही नज़र आता है ...जो मैंने टीवी पर देखा था.....बचपन में पैट्रिक पैटरसन ...गस लोगी....विवियन रिचर्ड्स उनके पोस्टर मेरे घर पर लगे थे ये सब मेरे भाई ने क्रिकेट सम्राट से निकाले थे.....२००६ में जब मैं मास कॉम कर रहा था...तो मेरी मम्मी ने मुझ से पूछा की तुम कौसने देश जाना पसंद करोगे....उस वक्त २००७ का वर्ल्ड कप वेस्टइंडीज़ में होना था ॥इसलिए मैने बिना सोचे कहा - वेस्टइंडीज़ और कहां....? खैर साल २००७ में ईएसपीएन में होने के बावजूद मैं उस पद पर नहीं था कि वेस्टइंडीज़ के दर्शन कर पाता... इसलिए सिर्फ वेस्टइंडीज़ से आने वाली खबरों को लिखता रहा....साल २०१० में मेरे लिए वो मौका लेकर कि मैं वेस्टइंडीज़ की सरज़मी पर अपने कदम रखूं ..हालांकि इस टूर से पहले मुझे बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा.....और एक वक्त तो ऐसा लगा कि मैं वेस्टइंडीज़ नहीं जा पाउंगा...पर अंदर से आवाज़ आ रही थी कि ये सपना सच होगा.....सच कहूं तो ..इस टूर ने मुझे ये यकीन दिला दिया....कि कुछ जिंदगी में कुछ चीज़ें फिक्स होती है ..और जब भगवान कुछ बड़ा देना चाहता हैं ..तो उससे पहले वो उस आदमी को तोलता जरूर है.....
वेस्टइंडीज़ का टूर भी भगवान ने मेरे लिए प्लान किया था और इसकी एक नही कई वजह है....और इसकी एक नहीं कई वजह है .....सबसे पहले ऑफिस से एप्रुवल मिलने में बहुत टाइम लगा ....हम जब पहली बार वीज़ा एप्लॉय करने गए तो डॉक्यूमेंट पूरे नहीं थे...और हमें खाली हाथ वापस आना पड़ा.....दिल बहुत निराश था ...क्योंकि अगले दो दिन वीज़ा डिपार्टमेंट की छुट्टी थी... और हमारे पास सिर्फ एक हफ्ते का वक्त बचा था.......दो दिन छुट्टी में वेस्ट हो गए और ५ दिन में य़ूके वीज़ा की उम्मीद करना बेइमानी थी ...इस दौरान हर जगह हाथ मारे ...रात-दिन वीज़ा मिलने के लिए कोशिश की कोई फायदा नहीं मिला.....लेकिन एक दिन अचानक फरिश्ते की तरह कोई आया और तीसरे दिन वीज़ा मेरे हाथ में था.....ये किसी चमत्कार से कम नहीं था क्योंकि यूके के वीजा को मिलने में कम से कम २१ दिनों का वक्त लगता है.... हमें सिर्फ ३ दिन में मिल गया......आधा काम हो चुका था.....और अब बाकी ता टिकट्स और बज़ट......उन दिनों वॉलकेनिक ऐश के वजह से ....भारत में ब्रिटेन जाने वाले कई हज़ार फंसे थे ...और लंदन का टिकट मिलना बेहद मुशकिल हो गया था... हमारी डेढ़ लाख की टिकट की कीमत साढे छ लाख हो चुकी थी....ऑफिस वाले भी घबरा गए थे क्योंकि बजट दोगुना हो चुका था ...और मेरे लिए सारे दरवाज़े बंद थे....... और उम्मीदी नाउम्मीदी में तब्दील हो रही थी.....मेरे उस वक्त शॉपिंग कर रहे थे क्योंकि उन्हे यकीन था कि हमारा टूर पक्का है ...मैंने जब उन्हे फोन पर बाताया....तो उन्हे शॉपिंग छोड़कर वापस घर लौटना पड़ा ...मैं बहुत निराश था..और सारी रात नींद नहीं आई ....सुबह उठा तो एक दोस्त से मिलना था ...मैं बाइक पर निकल पड़ा ......मेरे मोबाइल पर कॉल आ रही थी...बाइक चलाते हुए फोन आना मुझे इरिटेट करता है ....रेड लाइट पर जब रुका तो कॉल फिर आई ..मैंने फोन उठा कर देखा ..तो प्राइवेट नंबर था....मैं ने फोन पिक किया...तो दूसरी तरफ से आवाज़ आई- कहां रहते हो फोन क्यों नहीं उठाते ? वो हमारे सीईओ सुधर जी का फोन था......इतमें में ट्रैफिक सिग्नल ग्रीन हो गया......और मुझे किसी तरह से बाइक को साइट लगाना पड़ा....सुधीर जी ने बताया कि ...वो मुंबई में हैं...और मुझे भेजने का प्लान कर रहे हैं...इसके बाद मेरा फोन लगातार बिजी रहा कभी एचआर ..कभी एकाउंट्स ..और कभी सुधीर जी....हमारे टिकेट्स फोन पर ही फाइनल हो गए.....आधे घंटे में मेरे लिए दुनिया बदल गई थी ......मैंने अपने कैमरामैन को फोन करके बताया कि वो शॉपिंग कर सकते हैं ..और हम जा रहै हैं......ये सुनकर उन्हे भी बहुत खुशी हुई .....वो संडे का दिन था ...अगले दिन मुझे अपना ट्रैवलर कार्ड बनाना था ..सुधीर जी बजट को देखकर हैरान थे..उन्हे लग रहा था कि वेस्टइंडिज़ जैसी जगह को देखकर ये बजट कम है....क्योकि वो वहां पहले जा चुके थे और उन्हे वहां कि मंहगाई का अंदाज़ा था......जब मैं ट्रैवलर कार्ड बनाने गया......तो हेड ऑफिस के साइन ना मिलने की वजह से पूरा दिन कट गया ..लेकिन कार्ड नहीं बन सका....मुंझे फिर से अंदेशा होने लगा कि ....कहीं कुछ गड़बड़ होने वाली है ...इसलिए मैं शॉपिंग करने से भी डर रहा था ...खैर अगले दिन कार्ड भी बन गाया और हम जाने को तैयार थे ..मुझे शॉपिंग करने का बहुत कम वक्त मिला ...लेकिन मैं सिर्फ ये सोच रहा था ...कि इंडीज़ के इम्तिहन को हर हाल में पास करना है ....28 मई को एमिरेट्स की फ्लाइट से हमने ....वेस्टइंडीज़ के लिए कूच करा......



रविवार, 17 जनवरी 2010

शादी के बाद टेनिस छोड़ देंगी सानिया

शादी के बाद टेनिस छोड़ देंगी सानिया

लाखों जवां दिलों की धड़कन भारत की सबसे सफल महिला टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने खुलासा किया कि शादी के बाद वह टेनिस छोड़ देगी।
सानिया की 2009 जुलाई में अपने बचपन के दोस्त सोहराब मिर्जा से सगाई हुई थी, हालांकि उन्होंने शादी की योजना के बारे में खुलासा नहीं किया, लेकिन कहा कि वह शादी के बंधन में बंधने के बाद खेल को अलविदा कह देगी। सानिया ने कहा, 'फिलहाल तो मेरी इच्छा है कि शादी के बाद मैं पेशेवर टेनिस नहीं खेलूंगी, लेकिन अभी इसमें थोड़ी देर है।' इस भारतीय टेनिस स्टार से सगाई से पहले सोहराब ने कहा था कि सानिया को अपने करियर के बारे में फैसले लेने की पूरी आजादी है। सोहराब ने जून में कहा था कि वह जो कुछ भी करना चाहती है, उसे मेरा पूरा सहयोग और समर्थन मिलेगा। यह उसका फैसला होगा कि वह कितने लंबे समय तक खेलना चाहती है।
यह पूछे जाने पर कि शादी के बाद टेनिस छोड़ने का फैसला पूरी तरह सानिया का होगा तो इस स्टार के पिता इमरान मिर्जा ने कहा, 'अब तक यही उसका फैसला है। अगर वह बाद में शादी के बाद खेलना चाहती है, तो यह उसकी पसंद होगी।' वर्ष 2003 में पेशेवर बनने वाली सानिया तब से ही डब्ल्यूटीए सर्किट में भारतीय टेनिस का चेहरा बनी हुई है। पिछले साल सानिया ने हमवतन महेश भूपति के साथ आस्ट्रेलियाई ओपन का मिश्रित युगल खिताब जीता था, जिसे वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली भारत की पहली महिला ग्रैंडस्लैम विजेता बन गई थी।

बाबा mehta

बुधवार, 6 जनवरी 2010

हार से हुई साल की शुरूआत

हैप्पी नहीं इयर 20टेन



अपनी किस्मत की कहानी अगर कोई लिखना चाहता है तो वो उसी वक्त हार की ओर चल देता है । जीत उनके कदमों से कोसों दूर हो जाती है और मंजिल का तो अता-पता ही नहीं होता। मैं ये लाइन इसलिए लिख रहा हूं कि टीम इंडिया ने दावा किया था कि साल 20टेन की शुरूआत जीत के साथ करेंगे और दावा मजबूत भी दिखा क्योंकि बांग्लादेश में ट्राईसीरीज के दौरान टीम इंडिया अपना पहला मैच उस टीम के खिलाफ खेल रही थी जिसे 2009 के अंत में करारी शिकस्त दी थी। सबकी उम्मीदें भारत श्रीलंका के खिलाफ मुकाबले पर टिक गई। पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम इंडिया ने अच्छा खासा स्कोर भी खड़ा कर दिया। 279 रन बनाकर टीम इंडिया ने श्रीलंका को हराने का ख्वाब भी देख लिया लेकिन माही की सेना ये भूल चुकी थी की पिछला सीरीज उन्होंने बल्लेबाजों के दम पर जीता था न कि गेंदबाजों की बदौलत। 280 रनों का पीछा करने उतरी श्रीलंकाई टीम दिलशान,जयवर्धने जयसूर्या,मेंडिस और मुरलीधरन के बगैर ये मैच आसानी से जीत ले गई। और सेनापति धोनी के अलावा उनके रणवीर खिलाड़ी देखते ही रह गए। ये थी साल 20टेन की शुरूआत में ही मिली करारी शिकस्त। मैच से पहले क्रिकेट फैंस से जीत का दावा करने वाले धोनी मैच के बाद अपनी गलतियों पर ध्यान न देकर हार के लिए ड्यू फैक्टर को जिम्मेदार ठहराने लगे । ये वही धोनी की वाणी है जिनके बारें में कहा जाता है कि किस्मत उनके दरवाजे पर सजदा करती है। तो क्या धोनी की किस्मत साल के शुरूआत में उनसे रूठ गई। या फिर धोनी उस लम्हें को भूल गए जब माही ने अपनी सेना के साथ न जाने कितने किले फतह किए। खैर हमारे एमएस साहब को भी समझ आ गया कि किस्तम के वो कब तक खाते रहेंगे कभी तो किस्मत उनसे आगे निकलेगी और हुआ भी वही हैप्पी न्यू ईयर अभी शुरू हुआ भी नहीं होगा कि माही की किस्मत उनसे आगे निकलना शुरू कर दिया। साल की पहली हार पर एक कहावत याद आ जाती है जिसे खासकर ग्रामीण इलाके में काफी बोली जाती है-बोहनी ही अच्छा नहीं हुआ तो दिन क्या खाक बेहतर गुजरेगा। ये कहावत खासकर बनिया समाज के लोग ज्यादा उपयोग में लातें है । यही हाल टीम इंडिया का हुआ है जीत से बोहनी नहीं हुई तो क्या खाक आगे की कहानी पहले से बताएंगे। खैर टीम इंडिया को जो होना था सो हो गया लेकिन पलटवार करने में माहिर माही के मतवाले का भरोसा भी नहीं होता क्योंकि सेनापति महेंद्र सिंह धोनी कभी भी अपनी रणनिती की धार दिखा सकतें है। लेकिन हम तो टीम इंडिया के रणबांकुरों से यही उम्मीद करतें है कि वो भारतीय फैंस का मनोबल यूं न तोड़ें ।

रजनीश मेहता
स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट