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खेल से खेल तक

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

फाइनल में भिड़ सकते हैं फेडरर व नडाल




साल के आखिरी ग्रैंड स्लैम में टेनिस होगा रोमांच पर

साल के आखिरी ग्रैंड स्लैम एक बार फिर रोमांच से भरा होगा। क्योंकि फेडरर के चिर प्रतिद्वंदी स्पेन के राफेल नडाल पूरी तरह से फिट होकर कोर्ट पर वापसी कर चुके हैं। आखिरी ग्रैंड स्लैंम में उम्मीद लगाई जा रही है किल टेनिस किंग रोजर फेडरर और बादशाह राफेल नडाल फाइनल की जंग में एक-दूसरे से भिड़ सकते हैं। इन दोनों को हालांकि 2005 के बाद पहली बार किसी ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंट में शीर्ष दो वरीयता नहीं मिली है।
यूएस ओपन के ड्रा के मुताबिक स्विटजरलैंड के वर्ल्ड नंबर वन टेनिस प्लेयर फेडरर और स्पेन के स्टार नडाल को एक दूसरे के उलट ग्रुप हाफ में जगह मिली है। पहली बार ब्रिटेन के एंडी मरे दूसरी रैंकिंग पर काबिज है ।सर्बिया के नोवाक जोकोविच और अमेरिका के एंडी रोडिक भी फेडरर के हाफ में शामिल हैं और एक-दूसरे से भिड़ सकते हैं। फिर विजेता का सामना शीर्ष वरीय से हो सकता है।

नडाल का मानना है कि ड्रॉ उनकी जीत की राह का रोड़ा बन ही नहीं सकती औऱ कोर्ट पर उनके सामने कोई भी उनको और उनके खेल पर उसका फर्क नहीं पड़ता है यानि नडाल के आत्मविश्वास को देखकर तो ऐसा लगता है कि इस बार फेडरर को ग्रैंड स्लैम में जीत हासिल करनें में एक बार फिर कोई रोक सकता है तो वो सिर्फ औऱ सिर्फ क्ले कोर्ट के बादशाह नडाल ही होंगे। यानि आखिरी ग्रैंड स्लैंम में टेनिस के जब दो धुरंधर फाइनल की जंग में आमने सामने होंगे तो उस वक्त टेनिस फैंस को वर्ल्ड का सबसे बेहतरीन टेनिस देखने को मिलेगा।
रजनीश कुमार स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट

सुपरस्टार नहीं रॉक स्टार हैं धोनी


धोनी रॉक


क्रिकेट के मैदान पर कई खिलाड़ी आए और गए। लेकिन दुनिया उन खिलाड़ियों को ज्यादा याद रखती है जिन्होने उन्हे एन्टरटेनमेंट दिया...यानी मैदान पर जिनके छक्के चौके देखकर...उन्हे रोमांच मिला ...यहीं वजह है ॥कि लोग द्रविज़ जैसे महान बल्लेबाज़ को भूल जाते हैं ...और सौरव गांगुली उन्हे ॥याद हैं...साफ तौर पर बात साफ है कि गंगुली ॥मैच में रोमांच को जन्म देते थे......धोनी के बारे में यही बात ....सच है ...माही मैदान पर होते हैं...तो मैच का रोमांच ही अलग होता ...स्टेडियम और बाहर का माहौल ही बदल जाता है ...सचिन के बाद शायद ही ऐसा क्रेज़ किसी खिलाड़ी के लिए आया हो......लेकिन धोनी सचिन से इस बात को लेकर अलग है ॥कि लोग ॥उनके स्टाइल के भी दिवाने हैं,,,,उनपर जितनी लड़कियां मरती है ...पुरुश फैंस की संख्या भी कई ज्यादा है ...जैसे एक रॉक स्टार ॥अपनी प्रेसेंटेशन से दर्शकों को बैठने नही देता ॥वैसे ही मैदान पर धोनी की प्रजेंस ...स्टेडियम में मैजूद फैंस को खामोश नही होने देती ...धोनी का यही असर ॥टीम पर भी लागू होता है ...जब नेपियर में धोनी मैच में नही उतरे थे ॥तो जीत के रथ पर सवार टीम इंडिया की बॉडी लेंग्वेज ही बदल गई थी.....
धोनी का सुर ...टीम और दर्शकों में जान डाल देता है ॥और इसलिए वो सिर्फ सुपरस्टार नही ॥बल्कि वो वर्तमान क्रिकेट के रॉक स्टार भी हैं...


रवीश बिष्ट (लेखक धोनी आर्मी के संस्थापक हैं)

बुधवार, 26 अगस्त 2009

दूध के धुले नहीं है सहवाग


सहवाग के सच का सामना


पिछले दिनों ...सहवाग और उनके होम बोर्ड डीडीसीए की जंग ने खूब सुर्खियां बटोरी ...लोग इस बात की पडताल करते रहे कि आखिऱ किस हद तक डीडीसीए में धांधली होती है...संयोग की बात है इनी दिनों ..फिरोज शाह कोटला में दिल्ली रणजी टीम का कंडिशनिंग कैंप भी आयोजित हुआ ...अब इसमें जो खिलाड़ी आता उसे ..डीडीसीए के साथ मान लिया जाता ...और जो खिलाड़ी चाहे वो किसी भी ..वजह से कैंप में हिस्सा नही पाता था..उसे सहवाग के साथ मान लिया जाता था ...कमाल की बात ये हैं ..कि जैसे ही ..वो खिलाड़ी अगले दिन कैंप में पहुंचता ...उस पर डीडीसीए के दबाव की बात मान ली जाती ......आखिरकार कई दिनों के अनुमान और आकलनों के बाद डीडीसीए प्रेसीडेंट की प्रेंस कॉफेंस हुई और सारा मामला ...साफ हुआ ..और असली तस्वीर सामने आई ....कुछ डीडीसीए झुका और कुछ सहवाग ...लेकिन डीडीसीए मामले में सहवाग का इतना साथ देने वाली मीडिया को सहवाग की तरफ से थैंक्यू तक सुनने को नही मिला...बल्कि ..सहवाग को तो ऐसा लगा कि उन्होने मीडिया को नया टॉपिक देकर उनपर एहसान किया है ... क्या सहवाग भूल गए कि अगर मीडिया ने उनका साथ ना दिया होता ...तो डीडीसीए पर कभी दबाव ना बनता ...वो कहते रहते .....और काम चलता रहता ...वैसे भी सहवाग के दिल्ली छोड़ने से डीडीसीए की सेहत पर कोई फर्क नही पड़ता ....उलटा सहवाग को ही नुक्सान उठाना पड़ता ..खैर छोडिए..असली मामला ये है कि सहवाग इस खेल के मैन ऑफ द मैच रहे ...लेकिन हकिकत कुछ और है ...क्या हमेशा डॉमेस्टिक क्रिकेट से दूर रहने वाले सहवाग को ..अचानक घरेलू क्रिकेट में धांधली की कहां से याद आ गई ....फिर उसपर अंडर 15 और अंडर 19 की बात समझ से परे हैं....पिछले साल वीरू ने सिर्फ एक मैच खेला ..और वो भी इसलिए ...क्योंकि भारत दौरे पर आई इंग्लैंड टीम ..मुंबई हमले के चलते ..अपने देश रवाना हो गई थी ..उससे पिछले सीज़न में उन्होने दिल्ली के लिए बल्ले नही उठाया ..आगे भी सीज़न व्यस्त है ...और उन्हे घरेलू क्रिकेट नही खेलनी ...तो फिर सहवाग इतना ड्रामा क्यों कर रहे थे.....साफ है स्पोर्ट्स कमेटी ....के राज में उनकी एक नही चल रही थी ...वो अपनी चलाना चाहते थे...वो अपनी मन मर्ज़ी के माफिक खिलाड़ी चुनना चाहते थे ....वो सलेक्शन में अपना दबदबा चाहते थे ...जब ऐसा नही हुआ ...तो छेड़ दिया बगावत का बिगुल ..उन्हे पता था ..कि इंडियन मीडिया इतनी ..वेली है ...कि बिना तह तक जाए ....इस मुद्दे को उठाएगी ..हुआ भी ऐसा ही ...अब कोई सहवाग से पूछे ...कि उनके दिल की तो हो गई ...उनके एक-दो आदमी को टीम में जगह भी मिल जाएगी .....लेकिन क्या वो ...ट्रांसपेरेंसी के नाम पर धूल नही झोंक रहे.....क्या वो वही काम नही करना चाहते जिसके वो दूसरों पर आरोप लगा रहे हैं...सच्चाई तो यही है ..और यही है सहवाग का सच का सामना..

रवीश बिष्ट

खेल पत्रकार

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

क्रिकेट का बिगड़ैल बच्चा छोड़ गया टेस्ट क्रिकेट को


अलविदा फ्रेडी

ओवल टेस्ट कई मायनों में इंग्लिश टीम के लिए यादगार रहा......ऐशेज़ सीरीज़ पर कब्जा करने के साथ ही इंग्लैंड के स्टार ऑलराउंडर एंड्रूय फ्लिटॉफ ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है......ओवल टेस्ट में मिली शानदार जीत से इंग्लिश टीम ने अपने सबसे चहेते क्रिकेटर को यादगार विदाई दी है इंग्लिश टीम के खिलाड़ी अपने फ्रेडी को नम आंखों से विदाई तो दे दी लेकिन इतिहास हमेशा इस खब्बू क्रिकेटर को याद रखेगा क्योंकि ये क्रिकेटर हार कर नहीं बल्कि जीत का डंका बजाकर क्रिकेट से अलविदा कह रहा है..

फ्लिंटॉफ भले ही अब टेस्ट क्रिकेट में दोबारा नजर आए......लेकिन वर्ल्ड क्रिकेट के ऑलटाइम ग्रेट ऑलराउंडर्स में शुमार एंड्रयू फ्लिंटॉफ को क्रिकेट फैंस अपनी ताउम्र नहीं भूल पाएंगे... ओवल टेस्ट मे इंग्लैंड टीम की शानदार जीत ने जहां लाखो इंग्लिश क्रिकेट फैन्स को.....ऐशेज़ का यादगार तोहफा दिया.....वहीं फ्लिंटॉफ की टेस्ट क्रिकेट से विदाई ने क्रिकेट फैन्स की आंखों को नम भी कर दिया.....हालांकि ये फ्लिंटॉफ के बुलंद हौसलों का ही कमाल था.....कि घुटने की चोट के दर्द को मात देकर फ्लिंटॉफ ने ओवल टेस्ट के लिए खुद को फिट किया......

इंग्लिश टीम के सबसे बड़े मैच विनर माने जाने वाले फ्लिंटॉफ.....ओवल टेस्ट में कुछ खास नहीं कर सके......लेकिन फ्लिंटॉफ की मैदान पर मौजूदगी ने ही इंग्लिश टीम के लिए टॉनिक का काम किया....साथ ही ऑस्ट्रेलिया कैंप में फ्लिंटॉफ की वापसी ने हड़कंप मचा दिया.....क्योकि ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग फ्लिंटॉफ का कहर.....साल 2005 की ऐशेज़ सीरीज़ में भी झेल चुके थे......तब अकेले फ्लिंटॉफ ही कंगारुओं टीम पर भारी पड़ गए थे......और एक बार फिर फ्लिंटॉफ ने कंगारुओं को हार के ताबूत तक पहुंचने का काम किया.....फ्लिंटॉफ ने मैच के चौथे दिन खतरनाक अंदाज में खेल रहे ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग को पैवेलियन भेजने में अहम भूमिका निभाई.....हस्सी के कॉल पर जैसे ही पॉन्टिंग एक रन लेने के लिए आगे बढ़े......तो मानो मिड ऑन पर खड़े फ्लिंटॉफ इसी मौके का इंतजार कर रहे थे.....फ्लिंटाफ ने चीते की फुर्ती से बॉल पकड़ी और स्टंप्स की बेल्स उड़ी दी.....और ऑस्ट्रेलियाई टीम को हार की ओर धकेल दिया.....ऐशेज़ में यादगार जीत दिलाकर फ्लिंटॉफ ने ना केवल इंग्लैंड को उसकी साख वापस दिलाई है.....बल्कि शानदार अंदाज में संन्यास लेकर क्रिकेट जानकारों को ये कहने पर मजबूर भी कर दिया है.....कि रिटायरमेंट हो.....तो ऐसा। शान से विदाई तो फ्रेडी ने टेस्ट क्रिकेट से ले ही ली है लेकिन फैंस को निराश होने की जरूरत नहीं क्योंकि फ्लिंटॉफ का जलवा वनडे क्रिकेट औऱ ट्वेंटी-ट्वेंटी में जरूर दिखता रहेगा..।


रजनीश कुमार स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट

क्या कंगारू हुए कंगाल ?


पॉटिंग का सूर्य अस्त ?

ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत अगर खत्म हुई है..तो उसमें पोन्टिंग का बैड लक भी शामिल रहा...जिस कप्तान ने लगातार दो वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया का झंडा बुलंद किया....2003 से टेस्ट रैंकिंग में अपनी टीम को नम्बर वन के दर्जे पर बनाए रखा...आज एक अदद जीत के लिए तरसता नज़र आ रहा है...अब इसे पॉन्टिंग का बैड लक नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे

एक खिलाड़ी
एक कप्तान
वो कभी ऑस्ट्रेलिया का सुरज हुआ करता था
लेकिन आज वो सूरज अस्त हो गया है
किसने सोचा था...कि एक वर्ल्ड चैम्पियन कप्तान औंधे मुंह ज़मीन पर गिर पड़ेगा.... वो भी इस तरह की फिर कभी उसे उठने का मौका ही नहीं मिलेगा... ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग कभी अपनी टीम पर नाज़ किया करते थे.... लेकिन किस्मत का फेर तो देखिए....आज मंज़र ऐसा है कि इस कप्तान को इसी की टीम ने कहीं का नहीं छोड़ा...

रिकी पॉन्टिंग की किस्मत ने ऐसी पलटी मारी...कि वो सीधे अर्श से फर्श पर आ गिरे..
पॉन्टिंग को ऐशेज़ सीरीज़ 2009 शुरू होने से पहले शायद ही ये अंदाज़ा रहा होगा...कि अगर सीरीज़ गंवाई तो एक ऐसा रिकॉर्ड उनके नाम हो जाएगा...जिसे हासिल करना कोई भी कंगारू कप्तान नहीं चाहेगा....
लेकिन अन्जाने में ही...पॉन्टिंग को ये सदमा भी लग गया...
1890 में बिली मर्डॉक के बाद पॉन्टिंग दूसरे ऐसे कप्तान बन गए, जिन्हें अपनी कप्तानी में इंग्लैंड की सरज़मीं पर लगातार दो एशेज़ सीरीज़ गंवानी पड़ी हो...
बतौर कप्तान पॉन्टिंग का ये हश्र...दर्शाने के लिए काफी है कि अब ये सुरज ढ़ल चुका है
हालांकि इस बीच यकीन करना भी थोड़ा मुश्किल है....कि जिस खिलाड़ी ने कप्तानी की ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए...ऑस्ट्रेलियाई टीम को टेस्ट क्रिकेट में सालों तक नम्बर वन के पायदान पर बनाए रखा.... दो बार क्रिकेट वर्ल्ड कप का ताज पहनाया....आज वही कप्तान कटघरे में खड़ा है.... ऑस्ट्रेलियाई मीडिया, जो कभी अपने सुपर कप्तान के गुण गाया करती थी....आज उसी से सवाल पूछ रही है.... ज़ाहिर है जब किस्मत साथ छोड़ती है...तो इंसान को जवाब देना भी मुश्किल हो जाता है...पंटर यानी रिकी पॉन्टिंग के साथ भी अब कुछ ऐसा ही हो रहा है।


रजनीश कुमार स्पोर्ट्स खबर

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

स्पीड किंग की वापसी


शूमाकर के लिए सड़के आसान नहीं !


हर खेल में कुछ ना कुछ ऐसे नाम हुए ...हैं ..जिनके नाम से खेल को जाना जाता है ...और उन्ही में से एक है...माइकल शूमाकर..जो एक बार फिर फॉर्मूला वन सर्किट में वापसी को तैयार हैं....फॉर्मूला वन या कार रेसिंग को जितनी पहचान ...माइकल शूमाकर ने दिलाई...उतनी शायद किसी ने नही ...भारत जैसे देश में जहां लोग क्रिकेट को दिवाने है...और दूसरे खेल के ज्यादातर खिलाड़ियों को नही जानते...लोकिन जो लोग दूसरे खेल के बारे में इंटरेस्ट रखते होगे ... शर्तिया कह सकता हूं कि वो ...माइकल शूमाकर के नाम से अनिभिज्ञ नही होंगे ...शूमाकर के नाम कई रिकॉर्ड दर्ज है ...वो 7 बा र फॉर्मूला वन चैंपियनशिप जीतने वाले ...अकेले ड्राइवर है....भला कोई कैसे भूल सकता है कि....साल 2000-2005 तक उन्होने 5 बार लगातार चैंपियनशिप जीतकर ...तहलका जो मचा दिया था......इसमें भी खास बात ये हैं कि ...साल 2002 में उन्होने सारी रेस में पोडियंम फिनिश किया...जिसे हासिल करने वाले वो एकलौते ड्राइवर है....जब शूमाकर अपने करियर की सुपर फॉर्म में थे ..उन दिनों मैं कॉलेज हुआ करता था...रोज़ अखबार में उनकी फोटो देखकर ..मेरा भी इंटरेस्ट ..फॉर्मूला वन की तरफ बढ़ा...शूमाकर मुझे बहुत अच्छे लगने लगे....मुझे याद है कि ...मैं उनका पोस्टर ढूढ़ने मार्केट में निकला ...लेकिन खरीद नही पाया......क्योंकि कोटद्वार ( मेरा गृह नगर )जैसी छोटी जगह में ये मुमकिन नही था.....रिटायरमेंट के अपने आखिरी साल में ...शूमाकर के करोड़ो फैंस की तरह मैं भी चाहता था ..कि वो चैंपियनशिप जीते...लेकिन तब ओलोंसों लय पकड़ चुके थे.....और शूमाकर के लिए फैरारी को दौड़ाना ..उतना आसान नही था.....वो कुछ ग्रा प्री जीतने के बाद ..तीसरे स्थान पर रहे...लेकिन फेरारी और फॉर्मूला वन को पॉपुलैरिटी दिलाने में शूमाकर का बड़ा हाथ रहा.....अब शूमाकर ...दोबारा वापसी को तैयार हैं....वो फेरारी के कंसलटेंट हैं...और फिलिपे मासा की चोट ने उन्हे सर्किट में लौटने के लिए मजबूर किया.....हालांकि ...2006 के बाद ये शूमाकर की पहली फॉर्मूला वन रेस होगी.....और बेशक सड़के उनके लिए नई ना हो ...लेकिन अब हालात बिलकुल जुदा होंगे....

रवीश बिष्ट ( खेल पत्रकार)

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

सानिया ने खत्म किया खिताबी सूखा

लेक्सिंगटन ओपन सानिया के नाम
भारत की सर्वोच्च वरीयता प्राप्त महिला टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने अपने देश के प्रशंसकों की जबरदस्त हौसला अफजाई के बीच 50 हजार डालर ईनामी अंतरराष्ट्रीय टेनिस महासंघ [आईटीएफ] लेक्सिंग्टन चैलेंजर टेनिस टूर्नामेंट का एकल खिताब जीत लिया। सानिया ने छह साल बाद कोई चैलेंजर खिताब जीता है।
सानिया ने मुकाबलें में फ्रांस की जूली कोइन को 7-6, 6-4 से हराया। सानिया ने सेमीफाइनल मुकाबले में चीन की खिलाड़ी युआन मेंग को तीन सेट तक चले मुकाबले के बाद 6-1, 4-6, 6-4 से हराया था। विश्व की 83वीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी सानिया को अपने करियर का दूसरा चैलेंजर खिताब हासिल करने के लिए छह साल इंतजार करना पड़ा। इससे पहले सानिया ने 2003 में चैलेंजर खिताब जीता था। अगस्त में खेले जाने वाले साल के चौथे ग्रैंड स्लैम अमेरिकी ओपन के लिहाज से सानिया की यह जीत काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सानिया इसको लेकर खासा उत्साह थी। आयोजन समिति के एक सदस्य ने बताया, 'सानिया का कद बहुत बढ़ा है। उन्हे यहां खेलते देख आसपास के सभी भारतीय टेनिस प्रेमी यहां पहुंच गए थे। इनमें केंटुकी विश्वविद्यालय के छात्र और सेंट्रल केंटुकी शहर के भारतीय मूल के लोग शामिल है। सबने सानिया की जबरदस्त हौसलाअफजाई की।' जीत के बाद सानिया ने कहा, 'मैं अपने प्रदर्शन से खुश हूं। मेरी सबसे बड़ी ताकत यह है कि मेरे फोरहैड शॉट को कोई नहीं समझ सकता। मैं फोरहैड शॉट कहीं भी लगा सकती हूं। फोरहैड की ताकत और अनुभव के कारण मुझे जीत मिली है। मैं इससे खुश हूं।'

रजनीश कुमार स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट