बुधवार, 30 जून 2010
वेस्टइंडिज़ - एक इम्तिहान एक चैलेंज़
वेस्टइंडीज़ का टूर भी भगवान ने मेरे लिए प्लान किया था और इसकी एक नही कई वजह है....और इसकी एक नहीं कई वजह है .....सबसे पहले ऑफिस से एप्रुवल मिलने में बहुत टाइम लगा ....हम जब पहली बार वीज़ा एप्लॉय करने गए तो डॉक्यूमेंट पूरे नहीं थे...और हमें खाली हाथ वापस आना पड़ा.....दिल बहुत निराश था ...क्योंकि अगले दो दिन वीज़ा डिपार्टमेंट की छुट्टी थी... और हमारे पास सिर्फ एक हफ्ते का वक्त बचा था.......दो दिन छुट्टी में वेस्ट हो गए और ५ दिन में य़ूके वीज़ा की उम्मीद करना बेइमानी थी ...इस दौरान हर जगह हाथ मारे ...रात-दिन वीज़ा मिलने के लिए कोशिश की कोई फायदा नहीं मिला.....लेकिन एक दिन अचानक फरिश्ते की तरह कोई आया और तीसरे दिन वीज़ा मेरे हाथ में था.....ये किसी चमत्कार से कम नहीं था क्योंकि यूके के वीजा को मिलने में कम से कम २१ दिनों का वक्त लगता है.... हमें सिर्फ ३ दिन में मिल गया......आधा काम हो चुका था.....और अब बाकी ता टिकट्स और बज़ट......उन दिनों वॉलकेनिक ऐश के वजह से ....भारत में ब्रिटेन जाने वाले कई हज़ार फंसे थे ...और लंदन का टिकट मिलना बेहद मुशकिल हो गया था... हमारी डेढ़ लाख की टिकट की कीमत साढे छ लाख हो चुकी थी....ऑफिस वाले भी घबरा गए थे क्योंकि बजट दोगुना हो चुका था ...और मेरे लिए सारे दरवाज़े बंद थे....... और उम्मीदी नाउम्मीदी में तब्दील हो रही थी.....मेरे उस वक्त शॉपिंग कर रहे थे क्योंकि उन्हे यकीन था कि हमारा टूर पक्का है ...मैंने जब उन्हे फोन पर बाताया....तो उन्हे शॉपिंग छोड़कर वापस घर लौटना पड़ा ...मैं बहुत निराश था..और सारी रात नींद नहीं आई ....सुबह उठा तो एक दोस्त से मिलना था ...मैं बाइक पर निकल पड़ा ......मेरे मोबाइल पर कॉल आ रही थी...बाइक चलाते हुए फोन आना मुझे इरिटेट करता है ....रेड लाइट पर जब रुका तो कॉल फिर आई ..मैंने फोन उठा कर देखा ..तो प्राइवेट नंबर था....मैं ने फोन पिक किया...तो दूसरी तरफ से आवाज़ आई- कहां रहते हो फोन क्यों नहीं उठाते ? वो हमारे सीईओ सुधर जी का फोन था......इतमें में ट्रैफिक सिग्नल ग्रीन हो गया......और मुझे किसी तरह से बाइक को साइट लगाना पड़ा....सुधीर जी ने बताया कि ...वो मुंबई में हैं...और मुझे भेजने का प्लान कर रहे हैं...इसके बाद मेरा फोन लगातार बिजी रहा कभी एचआर ..कभी एकाउंट्स ..और कभी सुधीर जी....हमारे टिकेट्स फोन पर ही फाइनल हो गए.....आधे घंटे में मेरे लिए दुनिया बदल गई थी ......मैंने अपने कैमरामैन को फोन करके बताया कि वो शॉपिंग कर सकते हैं ..और हम जा रहै हैं......ये सुनकर उन्हे भी बहुत खुशी हुई .....वो संडे का दिन था ...अगले दिन मुझे अपना ट्रैवलर कार्ड बनाना था ..सुधीर जी बजट को देखकर हैरान थे..उन्हे लग रहा था कि वेस्टइंडिज़ जैसी जगह को देखकर ये बजट कम है....क्योकि वो वहां पहले जा चुके थे और उन्हे वहां कि मंहगाई का अंदाज़ा था......जब मैं ट्रैवलर कार्ड बनाने गया......तो हेड ऑफिस के साइन ना मिलने की वजह से पूरा दिन कट गया ..लेकिन कार्ड नहीं बन सका....मुंझे फिर से अंदेशा होने लगा कि ....कहीं कुछ गड़बड़ होने वाली है ...इसलिए मैं शॉपिंग करने से भी डर रहा था ...खैर अगले दिन कार्ड भी बन गाया और हम जाने को तैयार थे ..मुझे शॉपिंग करने का बहुत कम वक्त मिला ...लेकिन मैं सिर्फ ये सोच रहा था ...कि इंडीज़ के इम्तिहन को हर हाल में पास करना है ....28 मई को एमिरेट्स की फ्लाइट से हमने ....वेस्टइंडीज़ के लिए कूच करा......
रविवार, 17 जनवरी 2010
शादी के बाद टेनिस छोड़ देंगी सानिया
शादी के बाद टेनिस छोड़ देंगी सानिया
लाखों जवां दिलों की धड़कन भारत की सबसे सफल महिला टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने खुलासा किया कि शादी के बाद वह टेनिस छोड़ देगी।
सानिया की 2009 जुलाई में अपने बचपन के दोस्त सोहराब मिर्जा से सगाई हुई थी, हालांकि उन्होंने शादी की योजना के बारे में खुलासा नहीं किया, लेकिन कहा कि वह शादी के बंधन में बंधने के बाद खेल को अलविदा कह देगी। सानिया ने कहा, 'फिलहाल तो मेरी इच्छा है कि शादी के बाद मैं पेशेवर टेनिस नहीं खेलूंगी, लेकिन अभी इसमें थोड़ी देर है।' इस भारतीय टेनिस स्टार से सगाई से पहले सोहराब ने कहा था कि सानिया को अपने करियर के बारे में फैसले लेने की पूरी आजादी है। सोहराब ने जून में कहा था कि वह जो कुछ भी करना चाहती है, उसे मेरा पूरा सहयोग और समर्थन मिलेगा। यह उसका फैसला होगा कि वह कितने लंबे समय तक खेलना चाहती है।
यह पूछे जाने पर कि शादी के बाद टेनिस छोड़ने का फैसला पूरी तरह सानिया का होगा तो इस स्टार के पिता इमरान मिर्जा ने कहा, 'अब तक यही उसका फैसला है। अगर वह बाद में शादी के बाद खेलना चाहती है, तो यह उसकी पसंद होगी।' वर्ष 2003 में पेशेवर बनने वाली सानिया तब से ही डब्ल्यूटीए सर्किट में भारतीय टेनिस का चेहरा बनी हुई है। पिछले साल सानिया ने हमवतन महेश भूपति के साथ आस्ट्रेलियाई ओपन का मिश्रित युगल खिताब जीता था, जिसे वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली भारत की पहली महिला ग्रैंडस्लैम विजेता बन गई थी।
बाबा mehta
बुधवार, 6 जनवरी 2010
हार से हुई साल की शुरूआत
हैप्पी नहीं इयर 20टेन अपनी किस्मत की कहानी अगर कोई लिखना चाहता है तो वो उसी वक्त हार की ओर चल देता है । जीत उनके कदमों से कोसों दूर हो जाती है और मंजिल का तो अता-पता ही नहीं होता। मैं ये लाइन इसलिए लिख रहा हूं कि टीम इंडिया ने दावा किया था कि साल 20टेन की शुरूआत जीत के साथ करेंगे और दावा मजबूत भी दिखा क्योंकि बांग्लादेश में ट्राईसीरीज के दौरान टीम इंडिया अपना पहला मैच उस टीम के खिलाफ खेल रही थी जिसे 2009 के अंत में करारी शिकस्त दी थी। सबकी उम्मीदें भारत श्रीलंका के खिलाफ मुकाबले पर टिक गई। पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम इंडिया ने अच्छा खासा स्कोर भी खड़ा कर दिया। 279 रन बनाकर टीम इंडिया ने श्रीलंका को हराने का ख्वाब भी देख लिया लेकिन माही की सेना ये भूल चुकी थी की पिछला सीरीज उन्होंने बल्लेबाजों के दम पर जीता था न कि गेंदबाजों की बदौलत। 280 रनों का पीछा करने उतरी श्रीलंकाई टीम दिलशान,जयवर्धने जयसूर्या,मेंडिस और मुरलीधरन के बगैर ये मैच आसानी से जीत ले गई। और सेनापति धोनी के अलावा उनके रणवीर खिलाड़ी देखते ही रह गए। ये थी साल 20टेन की शुरूआत में ही मिली करारी शिकस्त। मैच से पहले क्रिकेट फैंस से जीत का दावा करने वाले धोनी मैच के बाद अपनी गलतियों पर ध्यान न देकर हार के लिए ड्यू फैक्टर को जिम्मेदार ठहराने लगे । ये वही धोनी की वाणी है जिनके बारें में कहा जाता है कि किस्मत उनके दरवाजे पर सजदा करती है। तो क्या धोनी की किस्मत साल के शुरूआत में उनसे रूठ गई। या फिर धोनी उस लम्हें को भूल गए जब माही ने अपनी सेना के साथ न जाने कितने किले फतह किए। खैर हमारे एमएस साहब को भी समझ आ गया कि किस्तम के वो कब तक खाते रहेंगे कभी तो किस्मत उनसे आगे निकलेगी और हुआ भी वही हैप्पी न्यू ईयर अभी शुरू हुआ भी नहीं होगा कि माही की किस्मत उनसे आगे निकलना शुरू कर दिया। साल की पहली हार पर एक कहावत याद आ जाती है जिसे खासकर ग्रामीण इलाके में काफी बोली जाती है-बोहनी ही अच्छा नहीं हुआ तो दिन क्या खाक बेहतर गुजरेगा। ये कहावत खासकर बनिया समाज के लोग ज्यादा उपयोग में लातें है । यही हाल टीम इंडिया का हुआ है जीत से बोहनी नहीं हुई तो क्या खाक आगे की कहानी पहले से बताएंगे। खैर टीम इंडिया को जो होना था सो हो गया लेकिन पलटवार करने में माहिर माही के मतवाले का भरोसा भी नहीं होता क्योंकि सेनापति महेंद्र सिंह धोनी कभी भी अपनी रणनिती की धार दिखा सकतें है। लेकिन हम तो टीम इंडिया के रणबांकुरों से यही उम्मीद करतें है कि वो भारतीय फैंस का मनोबल यूं न तोड़ें ।
रजनीश मेहता
स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट
शनिवार, 5 सितंबर 2009
डॉ प्रवीण तिवारी की कलम से...
खिलाड़ियों और खेल संघों के बीच मीडिया गुरुवार, 27 अगस्त 2009
फाइनल में भिड़ सकते हैं फेडरर व नडाल


साल के आखिरी ग्रैंड स्लैम एक बार फिर रोमांच से भरा होगा। क्योंकि फेडरर के चिर प्रतिद्वंदी स्पेन के राफेल नडाल पूरी तरह से फिट होकर कोर्ट पर वापसी कर चुके हैं। आखिरी ग्रैंड स्लैंम में उम्मीद लगाई जा रही है किल टेनिस किंग रोजर फेडरर और बादशाह राफेल नडाल फाइनल की जंग में एक-दूसरे से भिड़ सकते हैं। इन दोनों को हालांकि 2005 के बाद पहली बार किसी ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंट में शीर्ष दो वरीयता नहीं मिली है।
यूएस ओपन के ड्रा के मुताबिक स्विटजरलैंड के वर्ल्ड नंबर वन टेनिस प्लेयर फेडरर और स्पेन के स्टार नडाल को एक दूसरे के उलट ग्रुप हाफ में जगह मिली है। पहली बार ब्रिटेन के एंडी मरे दूसरी रैंकिंग पर काबिज है ।सर्बिया के नोवाक जोकोविच और अमेरिका के एंडी रोडिक भी फेडरर के हाफ में शामिल हैं और एक-दूसरे से भिड़ सकते हैं। फिर विजेता का सामना शीर्ष वरीय से हो सकता है।
नडाल का मानना है कि ड्रॉ उनकी जीत की राह का रोड़ा बन ही नहीं सकती औऱ कोर्ट पर उनके सामने कोई भी उनको और उनके खेल पर उसका फर्क नहीं पड़ता है यानि नडाल के आत्मविश्वास को देखकर तो ऐसा लगता है कि इस बार फेडरर को ग्रैंड स्लैम में जीत हासिल करनें में एक बार फिर कोई रोक सकता है तो वो सिर्फ औऱ सिर्फ क्ले कोर्ट के बादशाह नडाल ही होंगे। यानि आखिरी ग्रैंड स्लैंम में टेनिस के जब दो धुरंधर फाइनल की जंग में आमने सामने होंगे तो उस वक्त टेनिस फैंस को वर्ल्ड का सबसे बेहतरीन टेनिस देखने को मिलेगा।
रजनीश कुमार स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट
सुपरस्टार नहीं रॉक स्टार हैं धोनी

धोनी का सुर ...टीम और दर्शकों में जान डाल देता है ॥और इसलिए वो सिर्फ सुपरस्टार नही ॥बल्कि वो वर्तमान क्रिकेट के रॉक स्टार भी हैं...
रवीश बिष्ट (लेखक धोनी आर्मी के संस्थापक हैं)
बुधवार, 26 अगस्त 2009
दूध के धुले नहीं है सहवाग

रवीश बिष्ट
खेल पत्रकार
