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खेल से खेल तक

रविवार, 17 जनवरी 2010

शादी के बाद टेनिस छोड़ देंगी सानिया

शादी के बाद टेनिस छोड़ देंगी सानिया

लाखों जवां दिलों की धड़कन भारत की सबसे सफल महिला टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने खुलासा किया कि शादी के बाद वह टेनिस छोड़ देगी।
सानिया की 2009 जुलाई में अपने बचपन के दोस्त सोहराब मिर्जा से सगाई हुई थी, हालांकि उन्होंने शादी की योजना के बारे में खुलासा नहीं किया, लेकिन कहा कि वह शादी के बंधन में बंधने के बाद खेल को अलविदा कह देगी। सानिया ने कहा, 'फिलहाल तो मेरी इच्छा है कि शादी के बाद मैं पेशेवर टेनिस नहीं खेलूंगी, लेकिन अभी इसमें थोड़ी देर है।' इस भारतीय टेनिस स्टार से सगाई से पहले सोहराब ने कहा था कि सानिया को अपने करियर के बारे में फैसले लेने की पूरी आजादी है। सोहराब ने जून में कहा था कि वह जो कुछ भी करना चाहती है, उसे मेरा पूरा सहयोग और समर्थन मिलेगा। यह उसका फैसला होगा कि वह कितने लंबे समय तक खेलना चाहती है।
यह पूछे जाने पर कि शादी के बाद टेनिस छोड़ने का फैसला पूरी तरह सानिया का होगा तो इस स्टार के पिता इमरान मिर्जा ने कहा, 'अब तक यही उसका फैसला है। अगर वह बाद में शादी के बाद खेलना चाहती है, तो यह उसकी पसंद होगी।' वर्ष 2003 में पेशेवर बनने वाली सानिया तब से ही डब्ल्यूटीए सर्किट में भारतीय टेनिस का चेहरा बनी हुई है। पिछले साल सानिया ने हमवतन महेश भूपति के साथ आस्ट्रेलियाई ओपन का मिश्रित युगल खिताब जीता था, जिसे वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली भारत की पहली महिला ग्रैंडस्लैम विजेता बन गई थी।

बाबा mehta

बुधवार, 6 जनवरी 2010

हार से हुई साल की शुरूआत

हैप्पी नहीं इयर 20टेन



अपनी किस्मत की कहानी अगर कोई लिखना चाहता है तो वो उसी वक्त हार की ओर चल देता है । जीत उनके कदमों से कोसों दूर हो जाती है और मंजिल का तो अता-पता ही नहीं होता। मैं ये लाइन इसलिए लिख रहा हूं कि टीम इंडिया ने दावा किया था कि साल 20टेन की शुरूआत जीत के साथ करेंगे और दावा मजबूत भी दिखा क्योंकि बांग्लादेश में ट्राईसीरीज के दौरान टीम इंडिया अपना पहला मैच उस टीम के खिलाफ खेल रही थी जिसे 2009 के अंत में करारी शिकस्त दी थी। सबकी उम्मीदें भारत श्रीलंका के खिलाफ मुकाबले पर टिक गई। पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम इंडिया ने अच्छा खासा स्कोर भी खड़ा कर दिया। 279 रन बनाकर टीम इंडिया ने श्रीलंका को हराने का ख्वाब भी देख लिया लेकिन माही की सेना ये भूल चुकी थी की पिछला सीरीज उन्होंने बल्लेबाजों के दम पर जीता था न कि गेंदबाजों की बदौलत। 280 रनों का पीछा करने उतरी श्रीलंकाई टीम दिलशान,जयवर्धने जयसूर्या,मेंडिस और मुरलीधरन के बगैर ये मैच आसानी से जीत ले गई। और सेनापति धोनी के अलावा उनके रणवीर खिलाड़ी देखते ही रह गए। ये थी साल 20टेन की शुरूआत में ही मिली करारी शिकस्त। मैच से पहले क्रिकेट फैंस से जीत का दावा करने वाले धोनी मैच के बाद अपनी गलतियों पर ध्यान न देकर हार के लिए ड्यू फैक्टर को जिम्मेदार ठहराने लगे । ये वही धोनी की वाणी है जिनके बारें में कहा जाता है कि किस्मत उनके दरवाजे पर सजदा करती है। तो क्या धोनी की किस्मत साल के शुरूआत में उनसे रूठ गई। या फिर धोनी उस लम्हें को भूल गए जब माही ने अपनी सेना के साथ न जाने कितने किले फतह किए। खैर हमारे एमएस साहब को भी समझ आ गया कि किस्तम के वो कब तक खाते रहेंगे कभी तो किस्मत उनसे आगे निकलेगी और हुआ भी वही हैप्पी न्यू ईयर अभी शुरू हुआ भी नहीं होगा कि माही की किस्मत उनसे आगे निकलना शुरू कर दिया। साल की पहली हार पर एक कहावत याद आ जाती है जिसे खासकर ग्रामीण इलाके में काफी बोली जाती है-बोहनी ही अच्छा नहीं हुआ तो दिन क्या खाक बेहतर गुजरेगा। ये कहावत खासकर बनिया समाज के लोग ज्यादा उपयोग में लातें है । यही हाल टीम इंडिया का हुआ है जीत से बोहनी नहीं हुई तो क्या खाक आगे की कहानी पहले से बताएंगे। खैर टीम इंडिया को जो होना था सो हो गया लेकिन पलटवार करने में माहिर माही के मतवाले का भरोसा भी नहीं होता क्योंकि सेनापति महेंद्र सिंह धोनी कभी भी अपनी रणनिती की धार दिखा सकतें है। लेकिन हम तो टीम इंडिया के रणबांकुरों से यही उम्मीद करतें है कि वो भारतीय फैंस का मनोबल यूं न तोड़ें ।

रजनीश मेहता
स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट

शनिवार, 5 सितंबर 2009

डॉ प्रवीण तिवारी की कलम से...

खिलाड़ियों और खेल संघों के बीच मीडिया
मेरीकॉम आजकल सुर्खि़यों में हैं लेकिन सिर्फ़ खेल रत्न मिलने के लिए नहीं बल्कि उनके द्वारा स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के हिसार में लगाए जाने वाले ट्रैनिंग कैंप पर उठाए गए गंभीर सवालों की वजह से। मेरिकॉम ने बॉक्सिंग में नौ साल का लम्बा करियर देखा है, पद्मश्री से लेकर खेल रत्न जैसे सम्मान हासिल किए है लेकिन वो पहली बार किसी टेलिविजन चैनल के स्टूडियो में पहुंची। इस एक्सक्लुसिव बातचीत में मेरीकॉम ने जो ख़ुलासे किए वो चौंकाने वाले थे। विश्व चैंपियन बॉक्सर कैंप में जाते वक़्त अपने साथ अपने पति को या भाई को लेकर जाती हैं क्योंकि उन्हे डर रहता है की कोई बदमाश उनके साथ छेड़छाड़ न करें। ये उन लड़कियों और महिलाओं के लिए एक बड़ा धक्का हो सकता है
जो बॉक्सिंग, जूडो या ताइक्वांडो सीखकर करकर ख़ुद को इन बदमाशों के ख़िलाफ़ तैयार कर रही हैं। सबसे बड़ा बवाल उनके उस ख़ुलासे से हुआ जिसमें उन्होंने SAI (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते हुए ये कहा कि बार-बार मना करने के बावजूद हिसार में ही ट्रेनिंग कैंप लगाया जाता है जबकि यहां पर महिला खिलाड़ी सुरक्षित नहीं है। महिला खिलाड़ियों के साथ छेड़छाड़ होती है और उन पर अश्लील फ़ब्तियां कसी जाती है। हांलाकि इटरव्यू के दौरान मैंने एक बात ग़ौर की, कि वो इस बात से घबरा भी रही थी की कही उन पर अथॉरिटी कोई कार्रवाई न कर दे। मैंने सवाल किया की नौ साल के लंबे करियर में आपने कई कैंप हिसार में किए होंगे, फिर अब अचानक ये परेशानी क्यों सामने आई? कहीं खेल रत्न चुने जाने के बाद आपका कॉन्फिडेन्स तो नहीं बढ़ गया और अथॉरिटी के ख़िलाफ़ अब आपने आवाज़ उठाई? मेरिकॉम इंटरव्यू के दौरान कई बार चुप हुई और मुझसे उन्होंने कहा कि मैं इस पर अभी कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूं। ज़ाहिर था कि मेरिकॉम भले ही खेल रत्न हो गई हो लेकिन मन में एक डर तो है कि कहीं अथॉरिटी कोई ऐक्शन न ले ले।
गंभीर बात ये है कि जब इतनी बड़ी खिलाड़ी झिझक के साथ इतनी गंभीर परेशानी को रख रही हैं तो बाक़ी नये ख़िलाड़ियों की स्थिति का क्या कहना। मीडिया की सकारात्मक भूमिका से मेरीकॉम ख़ुश है क्योंकि जो बात ये खिलाड़ी अधिकारियों से कई बार कह चुके थे उसका असर अब मीडिया में इस ख़बर के आने के बाद हुआ है। अथॉरिटी इस मामले को गंभीरता से ले रही है। सहवाग का डीडीसीए पर ग़ुस्सा हो, सायना नेहवाल की वाडा को लेकर टीम इंडिया को दी गई नसीहत हो या फिर ताज़ा मामला एम। सी. मेरीकॉम का ख़ुलासा हो खेल संस्थानों और खिलाड़ियों के बीच की दूरियां साफ है और मीडिया इसमें ब्रिज का काम कर रहा है।
रजनीश कुमार

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

फाइनल में भिड़ सकते हैं फेडरर व नडाल




साल के आखिरी ग्रैंड स्लैम में टेनिस होगा रोमांच पर

साल के आखिरी ग्रैंड स्लैम एक बार फिर रोमांच से भरा होगा। क्योंकि फेडरर के चिर प्रतिद्वंदी स्पेन के राफेल नडाल पूरी तरह से फिट होकर कोर्ट पर वापसी कर चुके हैं। आखिरी ग्रैंड स्लैंम में उम्मीद लगाई जा रही है किल टेनिस किंग रोजर फेडरर और बादशाह राफेल नडाल फाइनल की जंग में एक-दूसरे से भिड़ सकते हैं। इन दोनों को हालांकि 2005 के बाद पहली बार किसी ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंट में शीर्ष दो वरीयता नहीं मिली है।
यूएस ओपन के ड्रा के मुताबिक स्विटजरलैंड के वर्ल्ड नंबर वन टेनिस प्लेयर फेडरर और स्पेन के स्टार नडाल को एक दूसरे के उलट ग्रुप हाफ में जगह मिली है। पहली बार ब्रिटेन के एंडी मरे दूसरी रैंकिंग पर काबिज है ।सर्बिया के नोवाक जोकोविच और अमेरिका के एंडी रोडिक भी फेडरर के हाफ में शामिल हैं और एक-दूसरे से भिड़ सकते हैं। फिर विजेता का सामना शीर्ष वरीय से हो सकता है।

नडाल का मानना है कि ड्रॉ उनकी जीत की राह का रोड़ा बन ही नहीं सकती औऱ कोर्ट पर उनके सामने कोई भी उनको और उनके खेल पर उसका फर्क नहीं पड़ता है यानि नडाल के आत्मविश्वास को देखकर तो ऐसा लगता है कि इस बार फेडरर को ग्रैंड स्लैम में जीत हासिल करनें में एक बार फिर कोई रोक सकता है तो वो सिर्फ औऱ सिर्फ क्ले कोर्ट के बादशाह नडाल ही होंगे। यानि आखिरी ग्रैंड स्लैंम में टेनिस के जब दो धुरंधर फाइनल की जंग में आमने सामने होंगे तो उस वक्त टेनिस फैंस को वर्ल्ड का सबसे बेहतरीन टेनिस देखने को मिलेगा।
रजनीश कुमार स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट

सुपरस्टार नहीं रॉक स्टार हैं धोनी


धोनी रॉक


क्रिकेट के मैदान पर कई खिलाड़ी आए और गए। लेकिन दुनिया उन खिलाड़ियों को ज्यादा याद रखती है जिन्होने उन्हे एन्टरटेनमेंट दिया...यानी मैदान पर जिनके छक्के चौके देखकर...उन्हे रोमांच मिला ...यहीं वजह है ॥कि लोग द्रविज़ जैसे महान बल्लेबाज़ को भूल जाते हैं ...और सौरव गांगुली उन्हे ॥याद हैं...साफ तौर पर बात साफ है कि गंगुली ॥मैच में रोमांच को जन्म देते थे......धोनी के बारे में यही बात ....सच है ...माही मैदान पर होते हैं...तो मैच का रोमांच ही अलग होता ...स्टेडियम और बाहर का माहौल ही बदल जाता है ...सचिन के बाद शायद ही ऐसा क्रेज़ किसी खिलाड़ी के लिए आया हो......लेकिन धोनी सचिन से इस बात को लेकर अलग है ॥कि लोग ॥उनके स्टाइल के भी दिवाने हैं,,,,उनपर जितनी लड़कियां मरती है ...पुरुश फैंस की संख्या भी कई ज्यादा है ...जैसे एक रॉक स्टार ॥अपनी प्रेसेंटेशन से दर्शकों को बैठने नही देता ॥वैसे ही मैदान पर धोनी की प्रजेंस ...स्टेडियम में मैजूद फैंस को खामोश नही होने देती ...धोनी का यही असर ॥टीम पर भी लागू होता है ...जब नेपियर में धोनी मैच में नही उतरे थे ॥तो जीत के रथ पर सवार टीम इंडिया की बॉडी लेंग्वेज ही बदल गई थी.....
धोनी का सुर ...टीम और दर्शकों में जान डाल देता है ॥और इसलिए वो सिर्फ सुपरस्टार नही ॥बल्कि वो वर्तमान क्रिकेट के रॉक स्टार भी हैं...


रवीश बिष्ट (लेखक धोनी आर्मी के संस्थापक हैं)

बुधवार, 26 अगस्त 2009

दूध के धुले नहीं है सहवाग


सहवाग के सच का सामना


पिछले दिनों ...सहवाग और उनके होम बोर्ड डीडीसीए की जंग ने खूब सुर्खियां बटोरी ...लोग इस बात की पडताल करते रहे कि आखिऱ किस हद तक डीडीसीए में धांधली होती है...संयोग की बात है इनी दिनों ..फिरोज शाह कोटला में दिल्ली रणजी टीम का कंडिशनिंग कैंप भी आयोजित हुआ ...अब इसमें जो खिलाड़ी आता उसे ..डीडीसीए के साथ मान लिया जाता ...और जो खिलाड़ी चाहे वो किसी भी ..वजह से कैंप में हिस्सा नही पाता था..उसे सहवाग के साथ मान लिया जाता था ...कमाल की बात ये हैं ..कि जैसे ही ..वो खिलाड़ी अगले दिन कैंप में पहुंचता ...उस पर डीडीसीए के दबाव की बात मान ली जाती ......आखिरकार कई दिनों के अनुमान और आकलनों के बाद डीडीसीए प्रेसीडेंट की प्रेंस कॉफेंस हुई और सारा मामला ...साफ हुआ ..और असली तस्वीर सामने आई ....कुछ डीडीसीए झुका और कुछ सहवाग ...लेकिन डीडीसीए मामले में सहवाग का इतना साथ देने वाली मीडिया को सहवाग की तरफ से थैंक्यू तक सुनने को नही मिला...बल्कि ..सहवाग को तो ऐसा लगा कि उन्होने मीडिया को नया टॉपिक देकर उनपर एहसान किया है ... क्या सहवाग भूल गए कि अगर मीडिया ने उनका साथ ना दिया होता ...तो डीडीसीए पर कभी दबाव ना बनता ...वो कहते रहते .....और काम चलता रहता ...वैसे भी सहवाग के दिल्ली छोड़ने से डीडीसीए की सेहत पर कोई फर्क नही पड़ता ....उलटा सहवाग को ही नुक्सान उठाना पड़ता ..खैर छोडिए..असली मामला ये है कि सहवाग इस खेल के मैन ऑफ द मैच रहे ...लेकिन हकिकत कुछ और है ...क्या हमेशा डॉमेस्टिक क्रिकेट से दूर रहने वाले सहवाग को ..अचानक घरेलू क्रिकेट में धांधली की कहां से याद आ गई ....फिर उसपर अंडर 15 और अंडर 19 की बात समझ से परे हैं....पिछले साल वीरू ने सिर्फ एक मैच खेला ..और वो भी इसलिए ...क्योंकि भारत दौरे पर आई इंग्लैंड टीम ..मुंबई हमले के चलते ..अपने देश रवाना हो गई थी ..उससे पिछले सीज़न में उन्होने दिल्ली के लिए बल्ले नही उठाया ..आगे भी सीज़न व्यस्त है ...और उन्हे घरेलू क्रिकेट नही खेलनी ...तो फिर सहवाग इतना ड्रामा क्यों कर रहे थे.....साफ है स्पोर्ट्स कमेटी ....के राज में उनकी एक नही चल रही थी ...वो अपनी चलाना चाहते थे...वो अपनी मन मर्ज़ी के माफिक खिलाड़ी चुनना चाहते थे ....वो सलेक्शन में अपना दबदबा चाहते थे ...जब ऐसा नही हुआ ...तो छेड़ दिया बगावत का बिगुल ..उन्हे पता था ..कि इंडियन मीडिया इतनी ..वेली है ...कि बिना तह तक जाए ....इस मुद्दे को उठाएगी ..हुआ भी ऐसा ही ...अब कोई सहवाग से पूछे ...कि उनके दिल की तो हो गई ...उनके एक-दो आदमी को टीम में जगह भी मिल जाएगी .....लेकिन क्या वो ...ट्रांसपेरेंसी के नाम पर धूल नही झोंक रहे.....क्या वो वही काम नही करना चाहते जिसके वो दूसरों पर आरोप लगा रहे हैं...सच्चाई तो यही है ..और यही है सहवाग का सच का सामना..

रवीश बिष्ट

खेल पत्रकार

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

क्रिकेट का बिगड़ैल बच्चा छोड़ गया टेस्ट क्रिकेट को


अलविदा फ्रेडी

ओवल टेस्ट कई मायनों में इंग्लिश टीम के लिए यादगार रहा......ऐशेज़ सीरीज़ पर कब्जा करने के साथ ही इंग्लैंड के स्टार ऑलराउंडर एंड्रूय फ्लिटॉफ ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है......ओवल टेस्ट में मिली शानदार जीत से इंग्लिश टीम ने अपने सबसे चहेते क्रिकेटर को यादगार विदाई दी है इंग्लिश टीम के खिलाड़ी अपने फ्रेडी को नम आंखों से विदाई तो दे दी लेकिन इतिहास हमेशा इस खब्बू क्रिकेटर को याद रखेगा क्योंकि ये क्रिकेटर हार कर नहीं बल्कि जीत का डंका बजाकर क्रिकेट से अलविदा कह रहा है..

फ्लिंटॉफ भले ही अब टेस्ट क्रिकेट में दोबारा नजर आए......लेकिन वर्ल्ड क्रिकेट के ऑलटाइम ग्रेट ऑलराउंडर्स में शुमार एंड्रयू फ्लिंटॉफ को क्रिकेट फैंस अपनी ताउम्र नहीं भूल पाएंगे... ओवल टेस्ट मे इंग्लैंड टीम की शानदार जीत ने जहां लाखो इंग्लिश क्रिकेट फैन्स को.....ऐशेज़ का यादगार तोहफा दिया.....वहीं फ्लिंटॉफ की टेस्ट क्रिकेट से विदाई ने क्रिकेट फैन्स की आंखों को नम भी कर दिया.....हालांकि ये फ्लिंटॉफ के बुलंद हौसलों का ही कमाल था.....कि घुटने की चोट के दर्द को मात देकर फ्लिंटॉफ ने ओवल टेस्ट के लिए खुद को फिट किया......

इंग्लिश टीम के सबसे बड़े मैच विनर माने जाने वाले फ्लिंटॉफ.....ओवल टेस्ट में कुछ खास नहीं कर सके......लेकिन फ्लिंटॉफ की मैदान पर मौजूदगी ने ही इंग्लिश टीम के लिए टॉनिक का काम किया....साथ ही ऑस्ट्रेलिया कैंप में फ्लिंटॉफ की वापसी ने हड़कंप मचा दिया.....क्योकि ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग फ्लिंटॉफ का कहर.....साल 2005 की ऐशेज़ सीरीज़ में भी झेल चुके थे......तब अकेले फ्लिंटॉफ ही कंगारुओं टीम पर भारी पड़ गए थे......और एक बार फिर फ्लिंटॉफ ने कंगारुओं को हार के ताबूत तक पहुंचने का काम किया.....फ्लिंटॉफ ने मैच के चौथे दिन खतरनाक अंदाज में खेल रहे ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग को पैवेलियन भेजने में अहम भूमिका निभाई.....हस्सी के कॉल पर जैसे ही पॉन्टिंग एक रन लेने के लिए आगे बढ़े......तो मानो मिड ऑन पर खड़े फ्लिंटॉफ इसी मौके का इंतजार कर रहे थे.....फ्लिंटाफ ने चीते की फुर्ती से बॉल पकड़ी और स्टंप्स की बेल्स उड़ी दी.....और ऑस्ट्रेलियाई टीम को हार की ओर धकेल दिया.....ऐशेज़ में यादगार जीत दिलाकर फ्लिंटॉफ ने ना केवल इंग्लैंड को उसकी साख वापस दिलाई है.....बल्कि शानदार अंदाज में संन्यास लेकर क्रिकेट जानकारों को ये कहने पर मजबूर भी कर दिया है.....कि रिटायरमेंट हो.....तो ऐसा। शान से विदाई तो फ्रेडी ने टेस्ट क्रिकेट से ले ही ली है लेकिन फैंस को निराश होने की जरूरत नहीं क्योंकि फ्लिंटॉफ का जलवा वनडे क्रिकेट औऱ ट्वेंटी-ट्वेंटी में जरूर दिखता रहेगा..।


रजनीश कुमार स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट